पूर्णिया सहित सीमांचल का जनादेश: एनडीए का प्रभाव, एआईएमआईएम की पकड़ और बदलते राजनीतिक संकेत

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सीमांचल के पूर्णिया की सात प्रमुख विधानसभा सीटों पर आए परिणाम इस बार कई नए राजनीतिक संकेत देकर गए हैं। धमदाहा से एनडीए की वरिष्ठ नेता लेसी सिंह ने लगभग 55 हजार के भारी अंतर से जीत दर्ज कर फिर साबित किया कि उनकी पकड़ क्षेत्र में बेहद मजबूत है। पूर्णिया सदर में भाजपा के विजय खेमका ने लगातार अपना विजय रथ आगे बढ़ाते हुए कांग्रेस प्रत्याशी जितेंद्र यादव को सहज अंतर से हराया। कसबा से लोजपा (रामविलास) के युवा उम्मीदवार नितेश सिंह की जीत ने एनडीए के उत्साह में और ऊर्जा भर दी।

धमदाहा की लेसी सिंह, पूर्णिया सदर के विजय खेमका, कसबा के नितेश सिंह और रूपौली के कलाधर मंडल की जीत ने जनता के भरोसे को स्पष्ट रूप से दिखाया। यह चुनाव कई मायनों में दो विचारधाराओं की लड़ाई जैसा रहा—कुछ नेताओं का अतिविश्वास और बड़बोलापन उनके लिए नुकसानदायक साबित हुआ, जबकि सरल और सहज व्यक्तित्व वाले उम्मीदवारों को जनता ने भरपूर समर्थन दिया।

राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर भी नेतृत्व की भूमिका स्पष्ट दिखी। तेजस्वी यादव द्वारा हर घर को नौकरी देने के दावे को लोगों ने अविश्वसनीय माना, वहीं केंद्र और राज्य सरकार द्वारा बिजली, महिला उद्यमिता सहायता, वृद्ध एवं विधवा पेंशन वृद्धि जैसे फैसलों ने जनता का झुकाव एनडीए की ओर बनाए रखा। लोकसभा चुनाव के लिहाज से देखा जाए तो विशेषकर पूर्णिया संसदीय क्षेत्र में इन नतीजों का व्यापक असर पड़ने की संभावना है। कई सीटों पर भीतरघात, खींचतान और मर्यादा से बाहर चुनावी कटाक्ष भी हार-जीत का निर्णायक कारण बने।

इधर, एआईएमआईएम ने सीमांचल में अपनी जमीनी उपस्थिति महज बनाए नहीं रखी बल्कि और मज़बूत की है। अमौर में अख्तरुल इमान की जीत और बायसी में गुलाम सरवर की बढ़त ने यह संदेश दिया कि सीमांचल की राजनीति में एआईएमआईएम एक स्थायी शक्ति बनकर उभर रही है।

बनमनखी में भाजपा के कृष्ण कुमार ऋषि की आसान जीत और एनडीए की धमदाहा, कसबा व पूर्णिया सदर में उल्लेखनीय सफलता ने गठबंधन की स्थिति को और मजबूत किया है। इन परिणामों ने साफ संकेत दिया है कि सीमांचल की जनता विकास, काम और स्थिर नेतृत्व को प्राथमिकता दे रही है। आने वाले समय में यही जनादेश राज्य और केंद्र की राजनीति को दिशा देने वाला साबित हो सकता है।