अंतर धार्मिक समागम में उपराष्ट्रपति ने किया वैश्विक शांति और धार्मिक सौहार्द का आह्वान

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उपराष्ट्रपति ने कहा कि गुरु तेग बहादुर जी का बलिदान धार्मिक स्वतंत्रता के इतिहास में अद्वितीय उदाहरण है। उन्होंने किसी सत्ता या किसी एक मत की श्रेष्ठता के लिए नहीं, बल्कि लोगों को अपने विवेक के अनुसार जीने और पूजा करने के अधिकार की रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान दिया। असहिष्णुता के दौर में उन्होंने उत्पीड़ितों के लिए ढाल बनकर खड़े होने का कार्य किया।

गुरु तेग बहादुर जी को ‘हिंद दी चादर’ की उपाधि से सम्मानित किए जाने का उल्लेख करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि उनका संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है। उन्होंने सिखाया कि करुणा से प्रेरित साहस समाज को बदल सकता है और अन्याय के सामने मौन रहना सच्चे धर्म के विपरीत है। उपराष्ट्रपति ने कहा कि गुरु तेग बहादुर का बलिदान आज के समय में भी मानवता को यह संदेश देता है कि शांति बल से नहीं, बल्कि न्याय, करुणा और मानवीय गरिमा के सम्मान से स्थापित होती है।

उपराष्ट्रपति ने विविधता में एकता को भारत की ताकत बताया। उन्होंने कहा कि प्राचीन काल से ही भारत ने विभिन्न आस्थाओं, विचारधाराओं और संस्कृतियों का स्वागत किया है, जिसे संविधान में विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास और पूजा की स्वतंत्रता के रूप में स्थान मिला है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के “एक भारत, श्रेष्ठ भारत” के आह्वान को भारत की सभ्यतागत आत्मा से जुड़ा दृष्टिकोण बताया और ‘विकसित भारत @2047’ के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए सामूहिक प्रयासों पर जोर दिया।

अंतर धार्मिक समागम का आयोजन राज्यसभा सदस्य और ग्लोबल इंटरफेथ हार्मनी फाउंडेशन के अध्यक्ष डॉ. विक्रमजीत सिंह साहनी ने किया। इस अवसर पर जैन आचार्य लोकेश मुनि, नामधारी सतगुरु उदय सिंह, इस्कॉन दिल्ली के अध्यक्ष मोहन रूपा दास, अजमेर दरगाह शरीफ के हाजी सैयद सलमान चिश्ती, रेव. फादर मोनोडीप डैनियल और सरदार तरलोचन सिंह सहित कई प्रमुख धार्मिक एवं आध्यात्मिक नेता उपस्थित थे।