जयपुर, 25 जनवरी । केंद्र सरकार ने गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर वर्ष 2026 के पद्म पुरस्कारों की घोषणा कर दी है। इस सूची में राजस्थान की तीन विशिष्ट हस्तियों को पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित करने की घोषणा की गई है। इनमें प्रसिद्ध भपंग वादक गफरूद्दीन मेवाती जोगी, अलगोजा वादक तगाराम भील और समाजसेवी स्वामी ब्रह्मदेव महाराज शामिल हैं। तीनों ने अपने-अपने क्षेत्र में दशकों से उल्लेखनीय योगदान दिया है।
गफरूद्दीन मेवाती जोगी डीग जिले के कैथवाड़ा गांव के निवासी हैं और 20 वर्षों से अलवर में रह रहे हैं। वे भपंग वादन और पांडुन का कड़ा के प्रसिद्ध लोक गायक हैं और इस लोक परंपरा के एकमात्र कलाकार माने जाते हैं। उन्हें पांडुन का कड़ा के 2500 से अधिक दोहे कंठस्थ हैं। देश-विदेश में उन्होंने कई मंचों पर भपंग वादन और लोक गायन की प्रस्तुतियां दी हैं। गफरूद्दीन को संगीत की शिक्षा विरासत में मिली। उनके पिता बुद्ध सिंह जोगी सारंगी के उस्ताद थे। मेवाती जोगी समुदाय हिंदू और मुस्लिम संस्कृति के समन्वय का प्रतीक है, जहां रामायण, महाभारत, भगवान श्रीकृष्ण और अन्य पौराणिक कथाओं को विशिष्ट शैली में गाया जाता है।
गफरूद्दीन को वर्ष 2016 में राज्य स्तरीय पुरस्कार, वर्ष 2024 में राष्ट्रपति पुरस्कार और संगीत नाटक अकादमी फैलोशिप सम्मान मिल चुका है। उन्होंने कहा कि उनके परिवार में आठ पीढ़ियों से भपंग और सारंगी वादन की परंपरा चली आ रही है, जिसे वे आज भी जीवंत बनाए हुए हैं।
तगाराम भील जैसलमेर के निवासी, राजस्थान के जाने-माने अलगोजा वादक हैं। उन्होंने अपनी अनूठी शैली से यूरोप, रूस, अमेरिका, जापान और अफ्रीका सहित 15 से अधिक देशों में भारतीय लोकसंगीत की छाप छोड़ी है। अलगोजा के साथ मटका और बांसुरी वादन में भी उन्हें महारत हासिल है।
तगा राम ने बचपन में अपने पिता से अलगोजा वादन सीखा। मात्र 10 वर्ष की आयु में उन्होंने इस वाद्य में दक्षता हासिल कर ली थी। वर्ष 1981 में 18 साल की उम्र में जैसलमेर में पहला मंच मिलने के बाद उनके करियर को नई दिशा मिली। तब से वे हर साल मरु महोत्सव की शान रहे हैं।
उन्होंने आकाशवाणी जैसलमेर के लिए कई रिकॉर्डिंग की और नेहरू युवा केंद्र संस्थान से भी जुड़े रहे। वर्ष 1996 में फ्रांस से अंतरराष्ट्रीय यात्रा की शुरुआत करने वाले तगा राम आज वैश्विक मंच पर राजस्थान की लोकधुनों के प्रतिनिधि हैं।
स्वामी ब्रह्मदेव महाराज समाजसेवा के क्षेत्र में लंबे समय से सक्रिय हैं। वे श्री जगदंबा अंधविद्यालय श्रीगंगानगर के संस्थापक हैं, जिसकी स्थापना 13 दिसंबर 1980 को की गई थी। यहां नेत्रहीन बच्चों को निःशुल्क शिक्षा और छात्रावास की सुविधा दी जाती है। संस्थान में मूक-बधिर बच्चों के लिए भी विद्यालय संचालित है।
उन्होंने जगदंबा धर्मार्थ नेत्र चिकित्सालय की भी स्थापना की, जिसके माध्यम से पिछले 25 वर्षों से निःशुल्क नेत्र जांच और उपचार शिविर लगाए जा रहे हैं। उनके गुरु संत बाबा करनैल दास महाराज थे। कई केंद्रीय व राज्य स्तर के नेता उनके दर्शन कर चुके हैं। पद्मश्री सम्मान की घोषणा के बाद प्रदेशभर में खुशी की लहर है।