उत्तरकाशी, 08 फ़रवरी । पहाड़ में अक्सर मार्च में खिलने वाला बुरांश का फूल इस बार फरवरी में ही खिल गया। इससे लोग हैरत में हैं और मौसम चक्र में परिवर्तन को ही इसकी वजह मानते हैं। जंगलों में कई जगह काफल पकने को तैयार है।
उत्तरकाशी के ऊंचे क्षेत्रों में पाया जाने वाला औषधीय गुणों से भरपूर बुरांस भी जलवायु परिवर्तन की गंभीर मार झेल रहा है। उत्तरकाशी जिले के अपर यमुना वन प्रभाग समेत टकनौर, मुखेम रेंज में इस बार जनवरी माह में ही समय से पहले ही बुरांस के फूल खिलने लगे जिससे बुरांस के फूल असमय नष्ट हो जाते हैं।
गौरतलब है कि उत्तराखण्ड में इस बार जाड़े का सीजन नवम्बर, दिसम्बर जनवरी माह बिना बर्फबारी और बारिश का के तापमान में असामान्य वृद्धि के कारण बुरांस के फूल अपने सामान्य समय से पहले खिलने लगे हैं, जिससे इसके प्राकृतिक जीवन चक्र पर संकट खड़ा हो गया है। सामान्य परिस्थितियों में बुरांस का डीएनए पौधे की कोशिकाओं को मार्च–अप्रैल में फूल बनने के संकेत देता है, जब तापमान 20 से 25 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचता है। लेकिन इस बार यही तापमान जनवरी माह में ही मिलने लगा है।
नतीजतन फूल बनने की प्रक्रिया समय से पहले शुरू हो जाती है, जबकि मौसम की अस्थिरता के कारण ये फूल टिक नहीं पाते। जनवरी में बुरांस की कलियां ठंड से बचने के लिए सेपल्स से ढकी रहती हैं। स्थायी तापमान वृद्धि होने पर ही ये सेपल्स हटते हैं। लेकिन जब कुछ दिनों के लिए तापमान अचानक बढ़ता है, तो डीएनए तुरंत हार्मोनल संकेत दे देता है। इसके बाद तापमान दोबारा गिरने पर कोमल पुंकेसर और स्त्रीकेसर इस झटके को सहन नहीं कर पाते और फूल असमय नष्ट हो जाते हैं।
वहीं पर्यावरण विद सुरेश भाई और ग्लेशियर लेडी शांति ठाकुर का कहना है कि बुरंस के फूल खिलना बदलते पर्यावरण का गंभीर संकेत है, जो सामान्य से 2 महीने पहले हो रहा है। आमतौर पर मार्च-अप्रैल में खिलने वाला यह फूल, तापमान में वृद्धि और कम बर्फबारी (विंटर वार्मिंग) के कारण जनवरी में ही लाल रंग से पहाड़ सजा रहा है। उन्होंने बताया कि बुरांस के कई औषधीय गुणों से भरपूर है। लेकिन बदले पर्यावरण की मार हिमालय बुरांस पर भी पड़ रही है।
वनस्पति वैज्ञानिक डाॅ. धनी आर्या बताते हैं कि बारिश और बर्फबारी नहीं होने से कुछ प्रजातियों को समय से पहले ही अनुकूल तापमान मिल रहा है। प्रदूषण बढ़ने से यह स्थिति आई है। जो चिंतनीय है। समय से पहले ही बुरांस के फूल खिलना जलवायु परिवर्तन के संकेत है।