आलीराजपुर, 27 फरवरी । मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव शुक्रवार को अमर क्रांतिकारी चंद्रशेखर आज़ाद के 95 वॉ बलिदान दिवस पर उनके जन्मस्थान चंद्रशेखर आज़ाद नगर स्थित ऐतिहासिक आज़ाद कुटिया पहुँचे। उन्होंने अमर शहीद चंद्रशेखर आज़ाद की आदमकद प्रतिमा पर नमन करते हुए पुष्पांजलि अर्पित की।
मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने इस अवसर पर स्वराज संस्थान संचालनालय मध्य प्रदेश शासन द्वारा क्रांतिकारी अमर शहीद चंद्र शेखर आजाद के जीवन पर व उनके स्वतंत्रता संग्राम में अविस्मरणीय योगदान पर आधारित प्रदर्शनी का अवलोकन किया। आज़ाद कुटिया परिसर में ही स्थापित संग्रहालय का अवलोकन मुख्यमंत्री डॉ यादव द्वारा किया गया, जहां उनके जीवन, संघर्ष और क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़े दस्तावेज, चित्र और स्मृतिचिह्न संजोए गए हैं। कई पर्यटक, विद्यार्थी, सामान्य जन यहाँ पहुँच कर स्वतंत्रता संग्राम की उस अदम्य भावना को महसूस करते हैं, जिसने भारत को स्वतंत्रता दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
इस अवसर पर मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव ने चंद्रशेखर आज़ाद की शहादत पर उन्हें स्मरण किया और कहा कि भारत के सभी क्रांतिकारी नायकों का स्वतंत्रता संग्राम में अतुलनीय योगदान रहा है। चंद्रशेखर आज़ाद जैसे वीर क्रांतिकारी ने दुर्गम परिस्थितियों में जन्म लेकर अनेक कठिनाइयों के बावजूद अपने अदम्य साहस और त्याग से देश और दुनिया में विशिष्ट पहचान बनाई। उन्होंने आदिवासी अंचलों के नायकों के संघर्ष को भी याद किया और कहा कि उन्होंने अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध कर स्वतंत्रता आंदोलन को मजबूत किया। इस अवसर पर उन्होंने जनजातीय नायक शहीद छीतू किराड़ के बलिदान को भी नमन करते हुए उनके योगदान को स्मरण किया।
इस दौरान अनुसूचित जाति कल्याण मंत्री नागर सिंह चौहान,सांसद अनीता चौहान, सम्भागायुक्त डॉ.सुदाम खाडे,आईजी अनुराग ,जिला कलेक्टर नीतू माथुर , पुलिस अधीक्षक रघुवंश सिंह भदौरिया सहित जनप्रतिनिधि एवं अधिकारी मौजूद रहे।
विदित हो कि 23 जुलाई 1906 को जन्मे चंद्रशेखर आज़ाद का प्रारंभिक जीवन इसी पावन भूमि पर बीता। बचपन में उन्होंने भील बालकों के साथ रहकर धनुष-बाण चलाना और निशानेबाजी की शिक्षा प्राप्त की। आदिवासी अंचल में पले-बढ़े आज़ाद ने यहीं से साहस, स्वाभिमान और संघर्ष की प्रेरणा ली, जो आगे चलकर उनके क्रांतिकारी जीवन की आधारशिला बनी। 27 फरवरी 1931 को इलाहाबाद (वर्तमान प्रयागराज) के अल्फ्रेड पार्क (अब चंद्रशेखर आज़ाद पार्क) में अपने एक साथी के विश्वासघात के कारण पुलिस ने उन्हें घेर लिया। उस दौरान उनके पास सिर्फ एक गोली बची थी, तो उन्होंने अपने संकल्प के अनुसार स्वयं को गोली मारकर देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया।