नई दिल्ली, 03 अगस्त । उच्चतम न्यायालय की ओर से नियुक्त समिति ने यौन अपराधों से जुड़े मामलों में फैसला सुनाने वाले जजों को संवेदनशील रवैया सुनिश्चित करने के कई सुझाव दिए हैं। उच्चतम न्यायालय के पूर्व जज जस्टिस अनिरुद्ध बोस की अध्यक्षता वाली विशेषज्ञ समिति ने कहा है कि यौन अपराधों से जुड़े मामलों में फैसला सुनाते समय जजों को ‘प्रोसिक्यूट्रिक्स’ (शिकायतकर्ता महिला), ‘बेबस महिला’, ‘पवित्रता खो दी’, और ‘लज्जा भंग की’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल करने से बचना चाहिए।
’जजमेंट्स एंड जेंडर- सेंसिटिविटी एंड कंपैसन इन राइटिंग जजमेंट्स’ शीर्षक वाली रिपोर्ट में कहा गया है कि अदालतों को इन शब्दों की बजाय ’पीड़ित’, ’उत्तरजीवी’ , ’शिकायतकर्ता’, ’शारीरिक स्वायत्तता’ और यौन ’उत्पीड़न’ जैसे तटस्थ और पीड़ित केंद्रित शब्दों का उपयोग करना चाहिए। विशेषज्ञ समिति ने राज्य जुडिशियल अकेडमीज की सहायता से देश भर के 125 ट्रायल कोर्ट के फैसलों का विश्लेषण करने के बाद ये सिफारिशें कीं। विशेषज्ञ समिति ने कहा है कि अदालती कार्यवाही में संवेदनशील भाषा का इस्तेमाल सिर्फ शिष्टाचार की बात नहीं है, बल्कि यह निष्पक्षता, गरिमा और तटस्थता सुनिश्चित करने के लिए जरुरी है।