जयपुर, 21 अगस्त । राजस्थान उच्च न्यायालय ने गृह सचिव, अभियोजन निदेशक, अनुसूचित जाति विकास विभाग के सचिव और डीजीपी सहित अन्य से पूछा है कि एससी, एसटी नियम के उपनियम 7(3) के तहत एससी, एसटी से जुड़ी एफआईआर के लंबित अनुसंधान का रिव्यू क्यों नहीं किया जा रहा है। इसके साथ ही अदालत ने याचिकाकर्ता से जुड़ी एफआईआर में अब तक रहे जांच अधिकारियों का शपथ पत्र मांगा है। अदालत ने इन अनुसंधान अधिकारियों से पूछा है कि प्रकरण की जांच 60 दिन में पूरी क्यों नहीं हुई।
जस्टिस शुभा मेहता की एकलपीठ ने यह आदेश जितेन्द्र कुमार की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिए। अदालत ने कहा कि 26 माह की लंबी अवधि बीतने के बाद अभी तक अनुसंधान पूरा नहीं होना चिंताजनक है। अब तक जांच लंबित रहने का कारण भी अदालत को नहीं बताया गया है। इसके साथ ही यह भी नहीं बताया गया कि समिति ने किसी तरह का रिव्यू किया हो।
याचिका में अधिवक्ता सतीश कुमार ने अदालत को बताया कि याचिकाकर्ता ने साल 2024 में भरतपुर के सदर थाने में आईपीसी और एससी, एसटी एक्ट के तहत रिपोर्ट दर्ज कराई थी। वहीं मामले के आरोपी पक्ष ने भी एक क्रॉस एफआईआर इसी थाने में दर्ज कराई थी। एफआईआर दर्ज कराए दो साल तीन माह की अवधि पूरी हो चुकी है, लेकिन अभी तक अनुसंधान पूरा नहीं हुआ है। प्रकरण में अभी तक करीब आधा दर्जन जांच अधिकारी बदल चुके हैं। हर बार जांच अधिकारी याचिकाकर्ता को बुलाता है और इससे याचिकाकर्ता स्वयं का उत्पीड़न हो रहा है। याचिका में कहा गया कि एससी, एसटी नियम के उपनियम 7 (2) में प्रावधान है कि 60 दिन में जांच पूरी की जाएगी और उपनियम 3 के तहत लंबित जांच का गृह सचिव, अभियोजन निदेशक व अन्य की कमेटी हर तीन माह में रिव्यू करेगी। इसके बावजूद भी इस मामले में अभी तक जांच पूरी नहीं हुई है। दूसरी ओर जांच अधिकारी अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक दिनेश कुमार मीणा ने अदालत को बताया कि वे गत 23 जुलाई से मामले के जांच अधिकारी हैं। उन्होंने जुर्म प्रमाणित पाया है और दो सप्ताह में अदालत में नतीजा पेश कर दिया जाएगा। जिस पर सुनवाई करते हुए अदालत ने संबंधित अधिकारियों से शपथ पत्र पेश करने को कहा है।