सेप्सिस से बचाव के लिए जरूरी है चेतावनी संकेतों की समय पर पहचान:डॉ. वैभव भार्गव

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जयपुर, 12 सितंबर । सामान्य दिखने वाला संक्रमण कुछ ही घंटों में जानलेवा आपात स्थिति में बदल सकता है। विश्व सेप्सिस दिवस पर क्रिटिकल केयर विशेषज्ञों ने लोगों से संक्रमण के दौरान मरीज की स्थिति में अचानक होने वाले बदलावों को नजरअंदाज नहीं करने की अपील की। सेप्सिस संक्रमण के प्रति शरीर की अत्यधिक और अनियंत्रित प्रतिक्रिया है, जो समय पर उपचार नहीं मिलने पर सेप्टिक शॉक और कई अंगों के विफल होने का कारण बन सकती है।

फोर्टिस एस्कॉर्ट्स हॉस्पिटल जयपुर के सीनियर कंसल्टेंट-क्रिटिकल केयर मेडिसिन डॉ. वैभव भार्गव ने बताया कि सेप्सिस के शुरुआती लक्षण सामान्य संक्रमण जैसे हो सकते हैं। तेज या कठिन सांस, अचानक भ्रम, रक्तचाप गिरना, पेशाब कम होना और अत्यधिक कमजोरी जैसे संकेत मरीज की स्थिति बिगड़ने की चेतावनी हैं। ऐसे में तत्काल चिकित्सकीय उपचार जरूरी है। समय पर पहचान और उपचार गंभीर अंग विफलता से बचाने में महत्वपूर्ण हो सकता है।

सेप्सिस बैक्टीरियल, वायरल या फंगल संक्रमण के कारण हो सकता है। संक्रमण से लड़ने के बजाय शरीर की अत्यधिक प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया स्वस्थ ऊतकों और महत्वपूर्ण अंगों को नुकसान पहुंचाने लगती है। स्थिति बिगड़ने पर सेप्टिक शॉक और मल्टीपल ऑर्गन फेल्योर हो सकता है, जिसके लिए गहन चिकित्सा देखभाल की जरूरत पड़ती है।

चिकित्सकों के अनुसार तेज, उथली या कठिन सांस, सामान्य से बहुत तेज हृदय गति, भ्रम या अत्यधिक नींद, दिशाभ्रम अथवा अस्पष्ट बोलना, तेज बुखार, कंपकंपी या असामान्य रूप से कम तापमान, पेशाब की मात्रा में अचानक कमी, अत्यधिक सुस्ती और रक्तचाप में अचानक गिरावट सेप्सिस के गंभीर संकेत हो सकते हैं।

विशेषज्ञों ने घाव, यूरिनरी या सांस संबंधी संक्रमण की स्थिति बिगड़ने पर तत्काल चिकित्सकीय सलाह लेने की बात कही। बिना डॉक्टर की सलाह के बची हुई एंटीबायोटिक दवाएं लेने से बचने और चिकित्सक द्वारा निर्धारित एंटीबायोटिक का पूरा कोर्स करने की सलाह दी गई। अनावश्यक एंटीबायोटिक उपयोग से दवा-प्रतिरोधी सुपरबग्स का खतरा बढ़ता है। संक्रमण से बचाव के लिए घाव साफ रखना, नियमित हाथ धोना और चिकित्सकीय सलाह के अनुसार टीकाकरण कराना भी जरूरी है।

भारत में संक्रमण की रोकथाम, निगरानी और प्रभावी उपचार के साथ एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (एएमआर) की निगरानी पर भी जोर दिया जा रहा है। राजस्थान में भी एएमआर निगरानी से संबंधित पहल संचालित की जा रही हैं, ताकि जीवनरक्षक एंटीबायोटिक्स की प्रभावशीलता बनी रहे।