सुनवाई के दौरान विधानसभा सचिवालय की ओर से पेश वकील ने कहा कि केजरीवाल और सिसोदिया ये कहते रहे कि उनकी याचिका कोर्ट में लंबित है, इसलिए वे समिति के सामने नहीं आए। विधानसभा सचिवालय ने केजरीवाल और सिसोदिया की याचिका का विरोध करते हुए कहा है कि ये समन केवल विशेषाधिकार समिति का सहयोग करने के लिए जारी किया गया है ताकि फांसी घर की सच्चाई का पता लगाया जा सके।
12 नवंबर को सुनवाई के दौरान केजरीवाल और सिसोदिया की ओर से पेश वकील शादान फरासत ने कई सारे फैसलों का उदाहरण देते हुए कहा था कि ये याचिका सुनवाई योग्य है। उन्होंने कहा था कि विशेषाधिकार समिति का ये कदम डराने वाला है , वो भी तब जबकि इस समिति को केवल ये तय करने का अधिकार है कि विशेषाधिकार का हनन हुआ है कि नहीं। फरासत ने कहा था कि ऐसे समन विधानसभा के सुगम संचालन के लिए ही जारी किए जाते हैं। फांसी घर से विधानसभा के संचालन का क्या मतलब। विधानसभा भी नहीं चल रही है और कोई विशेषाधिकार हनन का प्रस्ताव भी लंबित नहीं है।
उच्च न्यायालय ने 11 नवंबर को कहा था कि याचिका प्रथम दृष्टया सुनवाई योग्य नहीं है। केजरीवाल और सिसोदिया ने याचिका दायर कर दिल्ली विधानसभा की विशेषाधिकार समिति की ओर से फांसी घर के रेनोवेशन में सार्वजनिक धन के दुरुपयोग के मामले पर जारी किए गए समन को चुनौती दी है। दरअसल दिल्ली विधानसभा परिसर के अंदर पूर्ववर्ती आम आदमी पार्टी की सरकार ने अघस्त 2000 में एक फांसी घर का उद्घाटन किया था। इस फांसी घर को ब्रिटिश कालीन बताया गया था। हालांकि वर्तमान भाजपा सरकार ने इस दावे को गलत बताया है और वो एक टिफिन रुम था। भाजपा सरकार ने केजरीवाल और सिसोदिया पर इतिहास के साथ तोड़-मरोड़ करने का आरोप लगाते हुए कहा है कि इसके निर्माण पर सार्वजनिक धन का दुरुपयोग किया गया। भाजपा विधायक प्रद्युम्न सिंह के नेतृत्व में दिल्ली विधानसभा की विशेषाधिकार समिति 13 नवंबर को बैठक कर इस फांसी घर की सत्यता की पड़ताल करेगी।
केजरीवाल और सिसोदिया ने याचिका दायर कर कहा है कि विशेषाधिकार समिति की कार्यवाही किसी शिकायत या रिपोर्ट के आधार पर या किसी विशेषाधिकार हनन के प्रस्ताव पर नहीं की गई है । ऐसे में विशेषाधिकार समिति की ये बैठक दिल्ली विधानसभा और खासकर इसके विशेषाधिकार समिति के अधिकार क्षेत्र के बाहर है। ये कार्यवाही पूरी तरह से गैरकानूनी और क्षेत्राधिकार के बाहर है। ये कार्यवाही याचिकाकर्ताओं के संविधान को अनुच्छेद 14, 19 और 21 के तहत मिले मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।