(गणेश शंकर विद्यार्थी/ बलिदान दिवस/ 25 मार्चय विशेष) अमर है इंकलाबी कलमकार का प्रताप

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मैं अपनी कलम से ही करूंगा, दुश्मनों के सर कलम ।’ निसंदेह हिंदी पत्रकारिता जगत के निर्भीक, क्रांतिकारी पत्रकार, स्वाधीनता सेनानी, समाजसेवी और कुशल राजनीतिज्ञ गणेश शंकर विद्यार्थी ने आजादी की लड़ाई में अपनी कलम को ही अपना अस्त्र बना लिया। उनके पास सत्ता की ताकत नहीं थी किंतु अपनी बेबाक धारदार कलम से अंग्रेज हुकूमत की दमनकारी नीतियों, सामाजिक अन्याय, शोषण और जमींदारों, सामंतों के अत्याचारों के विरुद्ध राष्ट्रहित जनहित में इंकलाब का उद्घोष किया। 26 अक्टूबर, 1890 को इलाहाबाद में जन्मे विद्यार्थी का बचपन मध्य प्रदेश के वर्तमान अशोकनगर जिले के मुंगावली में बीता। प्रारंभिक शिक्षा प्रयागराज में हुई। पढ़ाई के दौरान ही उनका विवाह हो गया। कानपुर कर्मस्थली रही। कानपुर के सूती मिल के मजदूरों की दुर्दशा देख उनके हितों के संघर्ष हेतु उन्हें संगठित किया। 1908 में कानपुर करंसी में नौकरी की बाद में हाईस्कूल में शिक्षक बने किंतु दोनों ही स्थान पर देशप्रेम को समर्पित ‘अभ्युदय’ पत्रिका पढ़ने से मना करने पर स्वाभिमानी विद्यार्थी ने नौकरी से

त्यागपत्र दे दिया।

1913 में महाराणा प्रताप के पराक्रम से प्रेरित होकर ‘प्रताप’ नामक साप्ताहिक पत्र प्रारंभ किया। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने आशीष स्वरुप ‘प्रताप’ के लिए यह पंक्तियां प्रेषित की “जिसको न निज गौरव तथा निज देश का अभिमान है, वह नर नहीं नर पशु निरा है और मृतक समान है” विद्यार्थी ने इसे आरंभ से अंत तक ‘प्रताप’ का मूल मंत्र बना पत्रकारिता को सामाजिक कर्म का प्रतीक निरूपित किया। प्रताप का समग्र सृजन नैतिक मूल्यों, आदर्शों, जन आंदोलनों और आजादी की लड़ाई के प्रति प्रतिबद्ध था। स्वाधीनता संग्राम के उच्चतम प्रतिमानों से प्रेरित होकर विद्यार्थी ने प्रताप के पहले अंक में ‘ प्रताप की नीति’ लेख लिखा जो आज भी पत्रकारिता के आदर्श घोषणा पत्र के रूप में प्रतिष्ठित है।

वे लिखते हैं, “आज अपने हृदय में नई-नई आशाओं को धारण करके और अपनी उद्देश्यों पर पूर्ण विश्वास रखकर प्रताप कर्म क्षेत्र में आता है। समस्त मानव जाति का कल्याण हमारा परमोद्देश्य है और इसकी प्राप्ति का एक बहुत बड़ा जरूरी साधन हम भारतवर्ष की उन्नति को समझते हैं।” वे ‘प्रताप’ के माध्यम से अपनी जिम्मेदारियों को रेखांकित करते हुए लिखते हैं, ”हम अपने देश और समाज की सेवा के पवित्र काम का भार अपने ऊपर लेते हैं। हम अपने भाइयों और बहनों को उनके कर्तव्य और अधिकार समझाने का यथाशक्ति प्रयत्न करेंगे। राजा और प्रजा में, एक जाति और दूसरी जाति में, एक संस्था और दूसरी संस्था में बैर और विरोध, अशांति और असंतोष ना होने देना हम अपना परम कर्तव्य समझेंगे।”

इसी लेख में वे पत्रकारिता के उद्देश्यों को स्पष्ट करते हुए लिखते हैं, “किसी की प्रशंसा या अप्रशंसा, किसी की प्रसन्नता या अप्रसन्नता, किसी की घुड़की या धमकी हमें अपने सुमार्ग से विचलित न कर सकेगी। सत्य और न्याय हमारे भीतरी पथ प्रदर्शक होंगे। सांप्रदायिक और व्यक्तिगत झगड़ों से प्रताप सदा अलग रहने की कोशिश करेगा। उसका जन्म किसी विशेष सभा, संस्था, व्यक्ति या मत के पालन पोषण, रक्षण या विरोध के लिए नहीं हुआ है किंतु उसका मत स्वातंत्र्य विचार और उसका धर्म सत्य होगा। हम जानते हैं कि हमें इस काम में बड़ी-बड़ी कठिनाइयों को सामना करना पड़ेगा और इसके लिए बड़े भारी साहस और आत्म बल की आवश्यकता है। हमें यह भी अच्छी तरह मालूम है कि हमारा जन्म निर्बलता, पराधीनता और अल्प सत्ता के वायुमंडल में हुआ है तो भी हमारे हृदय में सत्य की सेवा करने के लिए आगे बढ़ने की इच्छा है। हम न्याय में राजा और प्रजा दोनों का साथ देंगे परंतु अन्याय में दोनों में से किसी का भी नहीं। हमारी यह हार्दिक अभिलाषा है कि देश की विविध जातियों,संप्रदायों और वर्णों में परस्पर मेल मिलाप बढ़े।”

विद्यार्थी का अपने सिद्धांतों और मूल्यों के प्रति समर्पण अद्भुत था। अपने उद्देश्यों से भटकना वे मृत्यु के समान मानते थे। इसीलिए वह स्पष्ट करते हैं, “जिस दिन हमारी आत्मा ऐसी हो जाए कि हम अपने प्यारे आदर्श से डिग जावें, जानबूझकर असत्य के पक्षपाती बनने की बेशर्मी करें और उदारता, स्वतंत्रता तथा निष्पक्षता को छोड़ देने की भीरुता दिखाए, वह दिन हमारे जीवन का सबसे अभागा दिन होगा और हम चाहते हैं कि हमारी उस नैतिक मृत्यु के साथ ही हमारे जीवन का भी अंत हो जाए।” सचमुच विद्यार्थी की पत्रकारिता का यह कालजयी दर्शन आधुनिक भारतीय पत्रकारिता का प्रकाश स्तंभ है।

अपने क्रांतिकारी लेखों और भाषणों के कारण कई बार ‘प्रताप’ पर उन्हें जुर्माना, सजा, दंड, कुर्की और पांच बार जेल यात्रा की सौगातें प्राप्त हुई। उन्होंने महात्मा गांधी के अहिंसक आंदोलन के समर्थन के साथ ही भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों को हर प्रकार की सहायता उपलब्ध कराई। यद्यपि विद्यार्थी ने स्वराज अखबार से उर्दू में लिखना प्रारंभ किया था किंतु हिंदी के प्रति उनके ममत्व ने उन्हें हिंदी में लिखने हेतु प्रेरित किया।उन्होंने हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के हर संभव प्रयासों में अप्रतिम योगदान दिया। वह भाषा की महत्ता को गंभीरता से समझते थे इसीलिए एक बार बड़ी गहराई में उतर कर उन्होंने लिखा था, “मुझे देश की आजादी और भाषा की आजादी में से किसी एक को चुनना पड़े तो मैं नि:संकोच भाषा की आजादी चुनूंगा। देश की आजादी के बावजूद भाषा की गुलामी रह सकती है लेकिन अगर भाषा आजाद हुई तो देश गुलाम नहीं रह सकता। क्योंकि भाषा हमारे जातीय जीवन और संस्कृति की रक्षिका, शील का दर्पण और विकास का वैभव है। पराई भाषा चरित्र की दृढ़ता का अपहरण कर लेती है, मौलिकता का विनाश कर देती है और नकल करने का स्वभाव बना कर उत्कृष्ट गुणोंऔर प्रतिभा से नमस्कार करा देती है।”

उन्होंने हिंदी को साहित्यिक जटिलता से मुक्त कर भारत के स्वाधीनता संग्राम, जन जागरण, सांप्रदायिक सद्भाव,मजदूरों, किसानों और आम आदमी की भाषा बनाया। उनके लेखों में हिंदी सरल बोधगम्य सशक्त विद्रोही भाषा के रूप में विकसित हुई। उन्होंने विक्टर ह्यूगो के प्रसिद्ध उपन्यास ‘नाइंटी थ्री’ का हिंदी में बलिदान नाम से अनुवाद किया। हिंदी में शेखचिल्ली की कहानियां लिखी। हिंदी साहित्य सम्मेलनों में सक्रिय भागीदारी की और सरस्वती, कर्मयोगी, स्वराज्य, हित वार्ता में उनके क्रांतिकारी लेख प्रकाशित होते रहे। विद्यार्थी की प्रेरणा से 1924 में कानपुर कांग्रेस अधिवेशन में श्यामलाल गुप्त पार्षद द्वारा रचित झंडा गीत “विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊंचा रहे हमारा” का स्वागत गीत के रूप में सामूहिक गायन प्रस्तुत किया गया। यह गीत आज भी देशवासियों के मन में ऊर्जा का संचार करता है।

अंग्रेज हुकूमत ने 23 मार्च, 1925 को शहीद ऐ आजम भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी की सजा सुना दी। समग्र राष्ट्र शोक संतप्त हुआ। कानपुर में सांप्रदायिक दंगे भड़क गए। सर्व धर्म समभाव को भारत की आत्मा मानने वाले विद्यार्थी स्वयं सेवकों के साथ हिंदू मुस्लिम दंगों की धधकती ज्वाला को शांत करने, पीड़ित परिवारों को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाने के लिए उनके बीच चले गए। इसी दौरान दंगाइयों ने उनकी नृशंस हत्या कर दी। दो दिन बाद लाशों के ढेर में उनके शव की पहचान की गई। हैवानियत के उस नर्क में आजादी का स्वप्न देखने वाली आंखें सदा के लिए बंद हो गई। जिस धार्मिक कट्टरता और उन्माद को शांत करने के लिए वे जीवन भर संघर्ष करते रहे उसी ने ‘प्रताप’ को जीवन देने वाली लेखनी के साहसी योद्धा की जीवन यात्रा का ही जघन्य अवसान कर दिया। आजादी के लिए बलिदानों के महाकाव्य लिखने वाले असंख्य हुतात्माओं में गणेश शंकर विद्यार्थी का नाम सांप्रदायिक सद्भाव, मानवीय कल्याण, देश प्रेम देशभक्ति के निर्भीक इतिहास की वंदनीय शहादत बन गई।

उनका विश्वास था कि धर्म ने ज्ञान प्रचार का आदेश दिया, धार्मिक आडंबर ने घोर अज्ञान फैलाया।धर्म ने मनुष्य के सामने धर्म का सर्वश्रेष्ठ आदर्श रखा किंतु धार्मिक आडंबरों ने उसे पग पग पर पीछे धकेला है। मजहबी कर्मकांड और रस्म-ओ-रिवाज की रक्षा करने के स्थान पर देश तथा राष्ट्र की रक्षा करना मनुष्य जाति की उन्नति के लिए कहीं अधिक आवश्यक है। स्वतंत्रता का पवित्र आदेश है कि किसी को किसी के ऊपर स्वेच्छाचार करने का किसी को किसी का अधिकार छीनने हक नहीं होना चाहिए।

भू-मंडलीकरण के इस दौर में मीडिया बाजारवाद के दबाव में है। पत्रकारिता को बिकाऊ बनाने के प्रयास तेजी से हो रहे हैं और व्यावसायिकता की गला काट प्रतिस्पर्धा ने अखबारों को ‘उत्पाद’ के रूप में प्रस्तुत करना शुरू किया है। अतः भू-मंडलीकरण के दुष्प्रभावों से पत्रकारिता को बचाना इस दौर की सबसे बड़ी चुनौती है। आवश्यकता इस बात की है कि गणेश शंकर विद्यार्थी की निर्भीक, निष्पक्ष, निडर, देशभक्ति और देश प्रेम की उत्कट भावनाओं से ओत प्रोत पत्रकारिता के उच्चतम प्रतिमानों को आश्वस्तीदायक बनाया जाए ताकि भारतीय ज्ञान परंपरा, हमारी विपुल सांस्कृतिक धरोहरें और भारतीय जीवन दृष्टि अपने निर्मल स्वरूप में विश्वसनीयता के साथ राष्ट्रहित में विमर्श खड़ा करने के सामाजिक सरोकारों का दर्पण बन सकें।

(लेखक, पूर्व आईएएस और मोटिवेशनल स्पीकर हैं।)