बुधवार को झामुमो के केंद्रीय कार्यालय में आयोजित एक प्रेस वार्ता को संबोधित करते हुए सुप्रियो भट्टाचार्य ने कहा कि मानव इतिहास की पहली लोकतांत्रिक व्यवस्था आदिवासी समाज से ही शुरू होती है। उन्होंने कहा कि हजारों वर्ष पहले आदिवासी समाज में सामुदायिकता, सामूहिक निर्णय और प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व पर आधारित शासन व्यवस्था विकसित हो चुकी थी। इसके विपरीत, वर्तमान समय में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) संख्या के बल पर लोकतांत्रिक मूल्यों को कमजोर कर अधिनायकवादी व्यवस्था थोपने का प्रयास कर रही है, जबकि पेसा कानून ऐसे प्रयासों को पूरी तरह खारिज करता है।
उन्होंने अरावली पर्वत क्षेत्र का उदाहरण देते हुए कहा कि जिस प्रकार प्राकृतिक संसाधनों को कॉरपोरेट घरानों के हवाले किया गया, पेसा कानून ऐसी नीतियों पर प्रभावी रोक लगाने का माध्यम है।
भट्टाचार्य ने कहा कि पेसा अधिनियम-1996, उच्चतम न्यायालय के ऐतिहासिक ‘समता जजमेंट’ की भावना पर आधारित है, जिसमें आदिवासी क्षेत्रों में किसी भी परियोजना से पहले ग्राम सभा की सहमति तथा सामाजिक और पर्यावरणीय प्रभाव आकलन को अनिवार्य किया गया था। उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार ने समय के साथ इन प्रावधानों को कमजोर किया।
सुप्रियो भट्टाचार्य ने सवाल उठाया कि पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी, अर्जुन मुंडा और रघुवर दास जैसे नेता वर्षों तक सत्ता में रहे, फिर भी उनके कार्यकाल में पेसा कानून लागू क्यों नहीं हो सका। उन्होंने कहा कि हेमंत सोरेन सरकार ने सत्ता में लौटते ही एक वर्ष के भीतर पेसा नियमावली को लागू कर आदिवासी–मूलवासी समाज के अधिकार, पहचान और अस्मिता को मजबूती दी है।
उन्होंने कहा कि अब राज्य में शिक्षा, रोजगार और विकास की दिशा अफसरशाही नहीं, बल्कि ग्राम सभा तय करेगी और सरकार उसी के अनुरूप कार्य करेगी। पेसा कानून को झारखंड में जनतांत्रिक विकेंद्रीकरण की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम बताते हुए उन्होंने इसे राज्य के सामाजिक और सांस्कृतिक भविष्य के लिए मील का पत्थर करार दिया।————-