रांची, 27 जनवरी । ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आइसा) झारखंड ने 13 जनवरी को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की ओर से जारी किए गए उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता का प्रचार (समता संवर्धन) विनियम-2026 पर खुशी व्यक्त की है। इसे लेकर आइसा के राज्य सचिव त्रिलोकीनाथ ने मंगलवार को प्रेस वार्ता आयोजित कर कहा कि इन विनियमों का घोषित उद्देश्य धर्म, नस्ल, लिंग, जन्म-स्थान, जाति और विकलांगता के आधार पर होने वाले हर प्रकार के भेदभाव को समाप्त करना और उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता और समावेश को सुनिश्चित करना है।
उन्होंने कहा कि यह समझना जरूरी है कि ये नियम किसी सरकार या प्रशासनिक पहल का परिणाम नहीं, बल्कि वर्षों के छात्र संघर्षों, सामाजिक आंदोलनों और न्यायिक दबावों की उपज हैं। उन्हों ने कहा कि रोहित वेमुला, पायल तड़वी और दर्शन सोलंकी की संस्थागत हत्या ने यह उजागर किया कि 2012 के यूजीसी दिशा-निर्देश पूरी तरह अप्रभावी थे। 2026 के विनियमों में ओबीसी समुदाय को समानता और संरक्षण के दायरे में शामिल किया जाना एक महत्वपूर्ण और संवैधानिक रूप से आवश्यक कदम है, जिसे बहुत पहले लागू किया जाना चाहिए था।
त्रिलोकीनाथ ने कहा कि यूजीसी के अपने आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2019 से 2024 के बीच यूनिवर्सिटी और कॉलेजों में जाति आधारित भेदभाव की शिकायतें 118 प्रतिशत बढ़ गई हैं। ये जातिगत हिंसा की घटनाएं संस्थागत और राज्य की मिलीभगत से बने जातिवादी ढांचे का नतीजा हैं। इक्वल ऑपर्च्युनिटी सेंटर्स (समान अवसर केन्द्र) के दायरे का विस्तार, समता समिति, 24 घंटे की हेल्पलाइन और समता समूह जैसी व्यवस्थाएं स्वागतयोग्य हैं। लेकिन उन्होंने चेतावनी दी कि इन विनियमों के नाम पर राज्य विश्वविद्यालयों को केन्द्र सरकार के अधीन करने की कोशिश नहीं होनी चाहिए। इस मौके पर आइसा के जिला अध्यक्ष विजय कुमार, निखिल राज और स्वेता केवट उपस्थित थे।