जमानत याचिका में अधिवक्ता दीपक चौहान ने बताया कि मामले के शिकायतकर्ता से डॉ. मनीष की पूर्व में कभी मुलाकात ही नहीं हुई थी। वहीं न तो उसके कब्जे से रिश्वत राशि मिली है और ना ही उसकी ओर से इस राशि की मांग की गई थी। परिवादी ने भी यह आरोप नहीं लगाया है कि डॉ. मनीष अग्रवाल ने उससे कोई रकम डिमांड की है। इसके अलावा जो राशि रिश्वत की रकम बताई जा रही है वह उसके कब्जे से न मिलकर पास के प्लॉट में मिली थी। इसके अलावा अस्पताल प्रशासन ने टेंडर व बिल प्रक्रिया के लिए एक कमेटी बना रखी है। प्रार्थी के पास ब्रेन कॉइल का कोई बिल भी पेंडिंग नहीं था। बिल का भुगतान कमेटी के सदस्यों के सत्यापन के बाद ही किया जाता है। इसलिए उन्हें जमानत दी जाए। इसका विरोध करते हुए सरकारी वकील ने कहा कि याचिकाकर्ताओं पर रिश्वत लेने के गंभीर आरोप हैं। ऐसे में उन्हें जमानत नहीं दी जाए। दोनों पक्षों की बहस सुनने के बाद अदालत ने याचिकाकर्ताओं को जमानत पर रिहा करने के आदेश दिए हैं।