पिछले कई दशकों में यमुना की स्थिति सुधारने के लिए योजनाएँ बनीं, बजट आवंटित हुए, तकनीकी ढाँचे खड़े किए गए। सीवेज ट्रीटमेंट प्लांटों की संख्या बढ़ी, नालों को इंटरसेप्ट करने के प्रयास हुए, औद्योगिक इकाइयों के लिए मानक तय किए गए। न्यायपालिका और प्रशासन दोनों ने समय-समय पर दिशा-निर्देश दिए। इन प्रयासों को नकारा नहीं जा सकता। परंतु एक बुनियादी सच्चाई यह भी है कि नदी केवल पाइपलाइन और प्लांटों से नहीं बचती; वह उन लोगों से बचती है जो उसके साथ रहते हैं।
यमुना बेसिन में छह करोड़ से अधिक लोग निवास करते हैं। केवल दिल्ली महानगर की आबादी दो करोड़ के आसपास है। मथुरा, आगरा, इटावा, यमुनानगर और अन्य कस्बों को जोड़ दें तो यह संख्या और बढ़ जाती है। प्रतिदिन लाखों लीटर घरेलू सीवेज, ठोस कचरा, प्लास्टिक, पूजा सामग्री और औद्योगिक अपशिष्ट इस नदी तंत्र पर दबाव डालते हैं। सरकारें ढाँचा बना सकती हैं, पर हर गली से निकलने वाली नाली पर पहरा नहीं दे सकतीं।
यहीं समुदाय की भूमिका निर्णायक हो जाती है। जब तक नदी के किनारे रहने वाला व्यक्ति यह न माने कि यमुना उसकी अपनी है, तब तक कोई भी योजना स्थायी परिणाम नहीं दे सकती। नदी का प्रदूषण केवल प्रशासनिक समस्या नहीं, यह सामाजिक व्यवहार का प्रश्न भी है। हम अपने घर के आँगन को साफ रखते हैं, मोहल्ले की सड़क पर कचरा डालने से बचते हैं, पर वही कचरा जब नाले के माध्यम से नदी तक पहुँचता है, तो हमें उसका अहसास नहीं होता। नदी सार्वजनिक है और सार्वजनिक वस्तु के प्रति हमारी जिम्मेदारी अक्सर निजी वस्तु जितनी प्रबल नहीं होती।
जिस प्रकार हम समाज में रहते हुए यह समझते हैं कि हमारा व्यवहार दूसरों को प्रभावित करता है, सड़क पर कचरा न फैलाना, सार्वजनिक स्थानों को स्वच्छ रखना, नियमों का पालन करना, उसी प्रकार का सिविक सेंस हमें अपनी नदियों और प्रकृति के प्रति भी विकसित करना होगा। यदि हम मानते हैं कि समाज के बीच हमारा आचरण मर्यादित और जिम्मेदार होना चाहिए तो प्रकृति के साथ हमारा व्यवहार भी उतना ही अनुशासित होना चाहिए। अपशिष्ट को उपचारित किए बिना जलधाराओं में न छोड़ना ये केवल पर्यावरणीय उपाय नहीं बल्कि नागरिक चरित्र के संकेत हैं। जिस दिन प्रत्येक नागरिक यह स्वीकार कर लेगा कि प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी भी सामाजिक आचरण का हिस्सा है, उसी दिन से नदियों के पुनर्जीवन की वास्तविक शुरुआत होगी।
यमुना के प्रति यह जिम्मेदारी केवल पर्यावरणीय नहीं, सांस्कृतिक भी है। मथुरा और वृंदावन में इसके तट पर धार्मिक अनुष्ठान होते हैं, दिल्ली में छठ और अन्य पर्वों पर हजारों लोग इसके किनारे जुटते हैं। परंतु श्रद्धा यदि संवेदनशीलता में न बदले तो वह अधूरी रह जाती है। पूजा सामग्री का वैकल्पिक प्रबंधन, एकल-उपयोग प्लास्टिक से परहेज, सामूहिक सफाई अभियान ये छोटे कदम हैं, पर इनकी सामाजिक गूँज बड़ी होती है।
इसी संदर्भ में जल सहेलियों द्वारा यमुना की अविरलता और निर्मलता के लिए निकाली जा रही यात्रा का महत्व सामने आ रहा है। जल संरक्षण के क्षेत्र में कार्य कर रहीं जल सहेलियाँ जब यमुना के तटवर्ती गाँवों और शहरों में कदम-दर-कदम चल रही हैं तो वह केवल प्रतीकात्मक यात्रा नहीं होती। वह संवाद का माध्यम बनती है। यह यात्रा न किसी के विरोध में है, न किसी पर आरोप लगाने के लिए; इसका उद्देश्य लोगों को उनकी अपनी नदी से पुनः जोड़ना है।
इन दिनों जल सहेलियों द्वारा संचालित यह महिला-केन्द्रित यात्रा विश्व स्तर पर अपनी तरह की महत्वपूर्ण पहल है। सड़क पर उनका हर कदम यमुना की अविरलता और निर्मलता के प्रति उनके अटूट विश्वास और संकल्प को दर्शाता है।
जल सहेलियाँ वे महिलाएँ हैं जिन्होंने अपने-अपने क्षेत्रों में जल संरक्षण, तालाब पुनर्जीवन और सामुदायिक जागरूकता के कार्य किए हैं। जब वे यमुना के किनारे-किनारे चलकर लोगों से पूछती हैं क्या आपको याद है, यह नदी पहले कैसी थी? तो यह प्रश्न सीधा हृदय तक पहुँचता है। एक बुजुर्ग अपने बचपन की स्मृतियाँ साझा करता है, जब नदी का पानी पीने योग्य माना जाता था। एक किसान बताता है कि अब सिंचाई के लिए वैकल्पिक स्रोत ढूँढ़ने पड़ते हैं। एक युवा स्वीकार करता है कि प्लास्टिक का प्रयोग कम करना उसके हाथ में है।
इस पदयात्रा का सबसे बड़ा प्रभाव यह है कि यह जिम्मेदारी को स्थानीय बनाती है। नदी कोई दूर की नीति नहीं, वह पास की वास्तविकता है। जब किसी गाँव में बैठक होती है और लोग तय करते हैं कि अब से नाले को बिना उपचार के नदी में नहीं गिरने देंगे, जब मंदिर समितियाँ पूजा सामग्री के संग्रह के लिए अलग पात्र रखती हैं, जब बाजार संघ प्लास्टिक कम करने का संकल्प लेते हैं तो यह परिवर्तन योजनाओं को जमीन देता है।
अंतरराष्ट्रीय अनुभव भी यही बताते हैं कि नदियों का पुनर्जीवन केवल सरकारी परियोजना से संभव नहीं। यूरोप में टेम्स और राइन जैसी नदियों की स्थिति में सुधार तब आया जब स्थानीय समुदायों, उद्योगों और प्रशासन ने मिलकर दीर्घकालिक संकल्प लिया। जल सहेलियों द्वारा बुंदेलखंड में किये जा रहे छोटी नदियों के पुनर्जीवन के कार्य आज गवाह हैं कि जब समाज स्वयं नदी का संरक्षक बनता है, तब परिवर्तन टिकाऊ होता है।
यमुना के मामले में भी यही सूत्र लागू होता है। यदि यमुना बेसिन में नदी मित्र समूह सक्रिय हों, यदि स्कूलों में नदी-पाठ पढ़ाया जाए, यदि धार्मिक संस्थान पर्यावरण-सम्मत अनुष्ठानों को बढ़ावा दें, यदि औद्योगिक क्षेत्र पारदर्शिता से अपने अपशिष्ट प्रबंधन का विवरण साझा करें तो यह सामूहिक प्रयास नदी को राहत दे सकता है।
अविरल का अर्थ केवल निरंतर बहाव नहीं बल्कि अवरोधों से मुक्त जीवन है। निर्मल का अर्थ केवल स्वच्छ जल नहीं बल्कि स्वच्छ मनोभाव भी है। पदयात्रा इन दोनों अर्थों को जोड़ती है। यह लोगों को बताती है कि नदी को साफ रखना किसी एक विभाग का काम नहीं, यह सामाजिक अनुशासन का विषय है। जिस प्रकार हम यातायात नियमों का पालन करते हैं क्योंकि वह सामूहिक सुरक्षा से जुड़ा है, उसी प्रकार नदी के प्रति आचरण भी सामूहिक स्वास्थ्य से जुड़ा है।
यमुना का प्रश्न केवल पर्यावरण का नहीं, सार्वजनिक स्वास्थ्य का भी है। प्रदूषित जल से उत्पन्न रोग, भूजल पर दबाव, जैव-विविधता का क्षरण—ये सभी सीधे समाज को प्रभावित करते हैं। यदि नदी में घुली ऑक्सीजन का स्तर घटता है, तो मछलियाँ मरती हैं; यदि जल में रासायनिक तत्व बढ़ते हैं, तो वह कृषि और पेयजल दोनों को प्रभावित करते हैं। इसलिए नदी की चिंता भविष्य की चिंता है।
आज आवश्यकता आरोपों की नहीं, सहभागिता की है। योजनाएँ चलती रहें, तकनीकी सुधार होते रहें, पर साथ ही समाज अपने हिस्से की जिम्मेदारी स्वीकार करे। जल सहेलियों की पदयात्रा इसी स्वीकार का निमंत्रण है। वह यह कहती है कि परिवर्तन का रास्ता सरकार और समाज के बीच पुल बनाकर ही निकलेगा।
यमुना को बचाना किसी एक दिन का कार्यक्रम नहीं, यह सतत प्रक्रिया है। जब छह करोड़ लोग अपने-अपने स्तर पर छोटे-छोटे संकल्प लें कचरा पृथक्करण से लेकर जल संरक्षण तक तो नदी की धारा में फर्क दिखाई देगा। पदयात्रा उस चेतना का बीज बो रही है। बीज आज बोया जाए तो वृक्ष बनने में समय लगेगा, पर बिना बीज के वृक्ष की कल्पना नहीं की जा सकती।
अभी तक यात्रा के दौरान स्कूलों और कॉलेजों के साथ हुए संवाद से एक स्पष्ट विमर्श सामने आया है कि नदियों को पुनः निर्मल और अविरल बनाने के लिए अब युद्ध स्तर पर कार्य करना आवश्यक है। 21वीं सदी में हमें अपनी नदियों के संरक्षण और पुनर्जीवन को प्राथमिकता देनी ही होगी।
यमुना के तट पर खड़े होकर यदि हम यह तय करें कि यह नदी हमारी साझी विरासत है और इसे अगली पीढ़ी तक बेहतर रूप में पहुँचाना हमारा दायित्व है, तो यही सबसे बड़ा बदलाव होगा। पदयात्रा का संदेश सरल है—नदी को केवल देखिए मत, उससे जुड़िए।