वन्य जीवों के बचाव की तकनीक पर कार्यशाला शुरू

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बीकानेर, 05 मार्च । राजस्थान पशुचिकित्सा और पशु विज्ञान विश्वविद्यालय, बीकानेर के वन्य जीव अध्ययन एवं प्रबंधन केन्द्र द्वारा “वन्य जीवों के बचाव और विवाद निवारण“ विषय पर तीन दिवसीय कार्यशाला गुरुवार को शुरू हुई।

कार्यशाला के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए कुलगुरु डॉ. सुमंत व्यास ने कहा वर्तमान समय में शहरों और आसपास के क्षेत्रों में मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। उन्होंने वन्यजीव संरक्षण अधिनियम-1972 की हाल ही में संशोधित अनुसूचियों के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि इसमें कई नए वन्यजीवों को शामिल किया गया है, जिससे उनके संरक्षण को नई दिशा मिलेगी।

कुलगुरु डॉ. सुमन्त व्यास ने कहा पशु चिकित्सकों को प्रशिक्षण के माध्यम से अर्जित कौशल वन्यजीवों के रेस्क्यू, इलाज एवं संरक्षण हेतु लाभप्रद होगा। अधिष्ठाता वेटरनरी महाविद्यालय, बीकानेर प्रो. बी.एन. श्रृंगी ने कहा कि जमीनी स्तर पर सांपों की सुरक्षित हैंडलिंग अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि अधिकांश लोग विषैले और अविषैले सांपों में अंतर नहीं कर पाते है। ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रम पशु चिकित्सा अधिकारियों को व्यावहारिक ज्ञान प्रदान करते हैं, जिससे वे मानव-वन्यजीव संघर्ष की स्थिति में प्रभावी ढंग से कार्य कर सकें। निदेशक प्रसार शिक्षा प्रो. राजेश कुमार धूड़िया ने कहा कि भारत में वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में निरंतर कार्य हो रहा है। कुनो नेशनल पार्क में चीता पुर्नस्थापना परियोजना इसका एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। कार्यक्रम के दौरान उप वन संरक्षक संदीप छलानी ने वन्यजीव रेस्क्यू के दौरान आने वाली जमीनी स्तर की चुनौतियों और वन विभाग द्वारा किए जा रहे प्रयासों के बारे में जानकारी दी। कार्यक्रम के प्रारंभ में केंद्र के मुख्य अन्वेषक डॉ. जे.पी. कच्छावा ने सभी अतिथियों का स्वागत करते हुए बताया कि यह प्रशिक्षण कार्यक्रम पशु चिकित्सा अधिकारियों को वन्यजीवों के रेस्क्यू एवं पुनर्वास से संबंधित बुनियादी तकनीकों का प्रशिक्षण देना जा रहा है, जिससे वे क्षेत्र स्तर पर प्रभावी ढंग से कार्य कर सकेंगे। प्रशिक्षण कार्यक्रम के आयोजन में केंद्र के सह-अन्वेषक डॉ. एल.एन. सांखला तथा टीचिंग एसोसिएट डॉ. स्पर्श दुबे और डॉ. प्रियंका राठौड़ का भी सहयोग रहा।