बाइस महीने की सजा पर हाईकोर्ट का हस्तक्षेप

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प्रयागराज, 03 अप्रैल । इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने पत्नी को भरण -पोषण राशि न देने के मामले में 22 महीने की सजा काटने का आदेश देने के फेमिली कोर्ट झांसी के आदेश पर रोक लगाते हुए पति की तत्काल रिहाई का आदेश दिया है। अदालत ने कहा कि इस तरह लम्बी अवधि के लिए सिविल जेल में रखना कानून के अनुरूप नहीं है।

जस्टिस प्रवीण कुमार गिरी ने यह राहत देते हुए स्पष्ट किया कि चूंकि व्यक्ति सिविल कारावास में है, इसलिए उसकी रिहाई के लिए जमानत बांड या जमानतदार की आवश्यकता नहीं है। मामले में पति (ताहिर उर्फ बबलू) को झांसी के फैमिली कोर्ट ने पत्नी को 22 महीने तक भरण-पोषण राशि न देने पर जेल भेज दिया था। वह 3 दिसम्बर 2025 से जेल में बंद था।

पत्नी ने करीब 2.64 लाख रुपये की बकाया राशि की वसूली के लिए आवेदन दिया था। फैमिली कोर्ट ने यह मानते हुए कि हर महीने के लिए अलग आवेदन जरूरी नहीं है, एक ही आवेदन पर 22 महीने की सजा सुना दी थी। हाईकोर्ट में दायर याचिका में दलील दी गई कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125(3) के अनुसार, भरण-पोषण न देने पर अधिकतम एक महीने की सजा ही दी जा सकती है।

अदालत ने इस तर्क पर विचार करते हुए नोटिस जारी किया और जेल प्रशासन को आदेश भेजकर पति को तुरंत रिहा करने के निर्देश दिए। हाईकोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि बकाया राशि की वसूली के लिए सम्पत्ति कुर्क करने जैसे वैकल्पिक उपाय अपनाए जा सकते हैं, न कि लम्बे समय तक कारावास। मामले की अगली सुनवाई 18 मई को होगी।