खील के दीपक, कौड़ी की पोटली और चांदी के सिक्के से करें मां लक्ष्मी का पूजन

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जयपुर, 07 नवंबर । दीपावली पर मां लक्ष्मी के स्वागत की तैयारियां केवल घरों में दीप सजाने और पूजा की चौकी तैयार करने तक सीमित नहीं हैं। इस पर्व से जुड़ी कई ऐसी परंपराएं हैं, जिनका धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व माना जाता है। खील के दानों से दीप प्रज्वलित करना, धनिया-हल्दी और कौड़ी की पोटली बनाकर तिजोरी में रखना तथा चांदी के सिक्के का पूजन करना भी इन्हीं परंपराओं का हिस्सा है। दीपावली का पूजन केवल धन-समृद्धि की कामना नहीं, बल्कि सात्विकता, श्रद्धा और धार्मिक संस्कारों से भी जुड़ा है।

पंडित बनवारी लाल शर्मा ने बताया कि कार्तिक अमावस्या की रात्रि महालक्ष्मी पूजन के लिए विशेष मानी गई है। इस दिन महाकाली की आराधना का भी विधान है। महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती तीनों देवी शक्तियों के स्वरूप हैं। इनकी उपासना से परिवार में धन-धान्य, सुख-समृद्धि, आरोग्य और बच्चों के लिए ज्ञान-बुद्धि की कामना की जाती है।

उन्होंने बताया कि दीपावली पूजन से पहले पूजा स्थल की साफ-सफाई कर शुद्धिकरण करना चाहिए। इसके बाद चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर चावल के दानों से स्वस्तिक बनाएं। चौकी पर षोडश मातृका, नवग्रह और अन्य पूजन सामग्री स्थापित कर भगवान गणेश और मां लक्ष्मी की प्रतिमाएं विराजमान करें। पूजन में सबसे पहले बुद्धि के देवता गणेशजी, फिर वरुण देव, षोडश मातृका यानी कुलदेवी-कुलदेवताओं और नवग्रहों का पूजन करना चाहिए। इसके बाद महालक्ष्मी और गणेशजी की आराधना की जाती है।

पंडित शर्मा के अनुसार शास्त्रों में षोडशोपचार पूजन का विधान है, लेकिन विस्तार से पूजा नहीं कर पाने वाले श्रद्धालु पंचोपचार विधि से भी आराधना कर सकते हैं। इसमें शुद्धिकरण के बाद अर्घ्य, पाद्य और आचमन से देवताओं का पूजन, रोली-चावल अर्पित करना, नैवेद्य और भोग लगाना तथा तांबूल अर्पित करना शामिल है। तांबूल के रूप में पान के पत्ते पर सुपारी, लौंग और इलायची रखकर अर्पित की जाती है। वहीं षोडशोपचार पूजन में जनेऊ, यज्ञोपवीत और वस्त्र सहित 16 प्रकार के उपचार किए जाते हैं।

दीपावली पूजन में खील, बताशे और मिष्ठान का विशेष महत्व है। अलग-अलग क्षेत्रों में स्थानीय परंपराओं के अनुसार देवी-देवताओं को अलग-अलग मिठाइयों का भोग लगाया जाता है। कहीं इमरती और कंगन तो कहीं सफेद बर्फी अर्पित की जाती है। भगवान गणेश को मोदक और लड्डुओं का भोग लगाया जाता है। श्रद्धालु अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार नवधान्य और अन्य मिठाइयां भी अर्पित कर सकते हैं।

मां महालक्ष्मी की आराधना के दौरान ‘पद्मासन स्थिते देवी, परब्रह्म स्वरूपिणी, परमेशी जगन्माता महालक्ष्मी नमोस्तुते’ और ‘श्वेतांबर धरे देवी महालक्ष्मी नमोस्तुते’ जैसे स्तुति मंत्रों से प्रार्थना करनी चाहिए। इस दिन गोपाल सहस्रनाम, विष्णु सहस्रनाम, लक्ष्मी स्तोत्र और कमला स्तोत्र का पाठ भी शुभ माना गया है।

उन्होंने बताया कि ‘ॐ श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद, ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः’ मंत्र का जाप कर मां लक्ष्मी से परिवार की सुख-समृद्धि और उन्नति की कामना की जा सकती है। साथ ही पूजन में स्थापित देवी-देवताओं की प्रतिमाओं को विदाई देते समय भी पूरे सम्मान और श्रद्धा का भाव बनाए रखना चाहिए।