दिवसीय होती है। बस्तर दशहरा 618 वर्षों से परंपरानुसार मनाया जा रहा
है। इस पर्व का आरंभ वर्षाकाल के श्रावण मास की हरेली अमावस्या से होता है, जब रथ निर्माण के लिए प्रथम लकड़ी काटकर जंगल से लाया जाता
है। तत्पश्चात सिरहासार भवन में डेरी गड़ाई पूजा विधान के बाद रथ निर्माण के लिए विभिन्न गांवों से लकड़ियां लाकर रथ निर्माण कार्य प्रारंभ किया जाता है, वर्तमान में रथ निर्माण का कार्य जारी है।
75 दिनों की इस लम्बी अवधि में प्रमुख रूप से काछन गादी, पाट जात्रा, डेरी
धूमधाम व हर्षोल्लास से बस्तर के संभागीय मुख्यालय जगदलपुर में संपन्न होती हैं।
रथ परिक्रमा प्रारंभ करने से पूर्व काछनगुड़ी में कुंवारी कन्या पर सवार
काछन देवी कांटे के झूले में झूलाते हैं तथा उससे दशहरा मनाने की अनुमति एवं
निविघ्र संपन्नता का आशिर्वाद लिया जाता है। बस्तर दशहरा का सबसे आकर्षण का केंद्र
होता है, काष्ठï निर्मित विशालकाय दुमंजिला रथ में आस्था, भक्ति का प्रतीक-मां दंतेश्वरी का छत्र को रथारूढ़ कर
दशहरा शक्ति पूजा पर आधारित है। बस्तर का इलाका तांत्रिक शक्ति पर विश्वास करने
वाला है। बस्तर में तंत्र शक्ति की लोग ज्यादा पूजा करते हैं। यहां शक्ति के तौर पर माईं
दंतेश्वरी की पूजा करते हैं। इसलिए यहां रावण दहन नहीं होता। बस्तर के ग्रामीणाें
के कुलदेवी-देवता अलग-अलग हैं, लेकिन माईं दंतेश्वरी बस्तर राज परिवार की कुलदेवी हैं।