मंदिरों में प्रवेश के मुद्दे पर यह देखना होगा कि यह अधिकार काैन मांग रहा है : सुप्रीम कोर्ट

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नई दिल्ली, 29 अप्रैल । उच्चतम न्यायालय ने सबरीमाला मंदिर मामले पर सुनवाई के 10वे दिन बुधवार को पूछा कि कोई नास्तिक खासकर उत्तर भारत का गैर-श्रद्धालु सबरीमाला मंदिर में प्रवेश के अधिकार का दावा कैसे कर सकता है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ सदस्यीय संविधान बेंच ने कहा कि मंदिरों में प्रवेश के अधिकार के मुद्दे पर फैसला करते समय यह भी देखना होगा कि यह अधिकार कोई श्रद्धालु मांग रहा है या गैर-श्रद्धालु।

सुनवाई के दौरान दो महिलाओं की ओर से वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह ने कहा कि याचिकाकर्ताओं में से एक अनुसूचित जाति की महिला है और उसे मंदिर जाने से रोकना संविधान के अनुच्छेद 17 का उल्लंघन होगा। आज हमें कहा जा रहा है कि जातिगत व्यवस्था से परे हिंदू सबरीमाला में प्रवेश कर सकते हैं लेकिन महिलाएं नहीं। अनुच्छेद 17 के कारण सभी पुरुषों को जाति की परवाह किए बिना प्रवेश का अधिकार है। इस पर न्यायालय ने कहा कि महिला को अनुसूचित जाति से होने के कारण नहीं रोका गया था, बल्कि इसलिए रोका गया था क्योंकि वो 10 से 50 वर्ष आयु वर्ग की थी।

इंदिरा जयसिंह ने कहा कि सबरीमाला मंदिर में महिलाओं का बहिष्कार उनके जीवन के सबसे उत्पादक और सृजनशील काल यानी 10 से 50 वर्ष की आयु के बीच लागू होता है। आप मुझे आधा जीवन जीने को नहीं कह सकते। 10 से 50 वर्ष के बीच मत जियो, फिर 10 से पहले और 50 के बाद जियो। उन्होंने कहा कि मंदिर में प्रवेश और पूजा का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 25(1) के तहत मौलिक अधिकार है। वर्ष 2018 का फैसला आने के बाद दोनों महिलाएं मंदिर गई थीं। जब वे बाहर आईं तक कुछ नेताओं ने शुद्धिकरण की बात की। मैंने इस अदालत में याचिका दायर की। उस समय फैसला पूरी तरह लागू था। यही दो महिलाएं थीं जो ऊपर चढ़ने और मंदिर चढ़ने में सफल हुईं। तब से कोई और सफल नहीं हुआ।

सुनवाई के दौरान जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि यह अधिकार कौन मांग रहा है। क्या कोई श्रद्धालु यह अधिकार मांग रहा है या कोई गैर-श्रद्धालु और किसके कहने पर। एक व्यक्ति जिसका इस मंदिर से कोई संबंध नहीं है, वह कहीं उत्तर भारत में है। यह मंदिर दक्षिण भारत में है। प्रवेश का अधिकार मांगने के इस सवाल पर विचार करना जरुरी है।

उल्लेखनीय है कि 28 अप्रैल को उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि किसी धार्मिक संस्था के प्रबंधन के अधिकार का मतलब ये नहीं है कि उसके संचालन का कोई ढांचा न हो और प्रबंधन को लेकर अराजकता की स्थिति नहीं हो सकती है। ऐसी संस्थाओं के कामकाज के एक व्यवस्था होनी चाहिए।

सुनवाई के दौरान हजरत ख्वाजा निजामुद्दीन औलिया की दरगाह से जुड़ी चिश्ती निजामी परंपरा के वंशज पीरजादा सैयद अल्तमश निजामी के वकील निजाम पाशा ने कहा था कि दरगाह वो स्थान होता है जहां किसी संत को दफनाया गया हो। इस्लाम में मृत्यु के बाद संतों की स्थिति को लेकर अलग-अलग मत हैं, लेकिन सूफी आस्था प्रणाली में उस स्थान के प्रति गहरी श्रद्धा होती है, जहां किसी संत को दफनाया जाता है। पाशा ने कहा था कि किसी धार्मिक संस्था में प्रवेश को विनियमित करने का अधिकार प्रबंधन का हिस्सा है। इस पर जस्टिस अमानुल्लाह ने कहा था कि प्रबंधन के अधिकार का मतलब ढांचे का अभाव नहीं हो सकता है और हर चीज के लिए एक व्यवस्था होनी चाहिए, अराजकता नहीं हो सकती। चाहे दरगाह हो या मंदिर, संस्था से जुड़े तत्व होंगे और धार्मिक क्रियाओं का एक तरीका होगा और कार्यों के संपादन का क्रम होगा।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली इस बेंच में जस्टिस बीवी नागरत्ना, जस्टिस एमएम सुंदरेश, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, जस्टिस अरविंद कुमार, जस्टिस एजे मसीह, जस्टिस पीबी वराले, जस्टिस आर महादेवन और जस्टिस जॉयमाल्या बागची शामिल हैं।

उच्चतम न्यायालय ने 28 सितंबर 2018 को 4-1 के बहुमत से फैसला सुनाया था। न्यायालय ने कहा था कि महिलाओं के साथ काफी समय से भेदभाव होता रहा है। महिला पुरुष से कमतर नहीं है। एक तरफ हम महिलाओं को देवी स्वरुप मानते हैं दूसरी तरफ हम उनसे भेदभाव करते हैं। न्यायालय ने कहा था कि बायोलॉजिकल और फिजियोलॉजिकल वजहों से महिलाओं के धार्मिक विश्वास की स्वतंत्रता को खत्म नहीं किया जा सकता है।