रांची, 09 सितंबर । झारखंड उच्च न्यायालय ने डाक विभाग के कर्मचारी को लंबे समय तक निलंबित रखने के मामले में केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (कैट), पटना बेंच की सर्किट बेंच रांची के आदेश में हस्तक्षेप से इनकार कर दिया है। अदालत ने कहा कि बिना आरोप-पत्र जारी किए किसी कर्मचारी का तीन महीने से अधिक समय तक निलंबन जारी रखना कानून के अनुरूप नहीं है।
मुख्य न्यायाधीश एमएस सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने कैट के 18 जुलाई 2025 के आदेश को बरकरार रखते हुए डाक विभाग की रिट याचिका खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि कैट के आदेश में कोई स्पष्ट कानूनी त्रुटि या ऐसा विकृत निष्कर्ष नहीं है, जिसके आधार पर संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हस्तक्षेप किया जाए।
मामला गिरिडीह डाक मंडल में कोषाध्यक्ष रहे शशि भूषण कुमार के निलंबन से जुड़ा है। विभाग के अनुसार, गिरिडीह हेड पोस्ट ऑफिस और गिरिडीह टाउन एसओ में 26 करोड़ रुपये से अधिक के कथित वित्तीय घोटाले में उनकी भूमिका सामने आई थी। उन्हें 27 सितंबर 2019 को निलंबित किया गया था, जबकि विभागीय कार्रवाई के लिए आरोप-पत्र सात मार्च 2022 को, करीब ढाई वर्ष बाद जारी किया गया।
निलंबन की कई बार समीक्षा की गई और 18 नवंबर 2022 को इसे रद्द कर दिया गया। शशि भूषण कुमार ने निलंबन को कैट में चुनौती दी थी। कैट ने मूल निलंबन की तारीख से तीन महीने बाद जारी निलंबन-विस्तार आदेशों को रद्द करते हुए उस अवधि के वेतन का हकदार माना था। इसमें पहले से प्राप्त निर्वाह भत्ते की राशि घटाने का निर्देश दिया गया था।
डाक विभाग ने कैट के आदेश को उच्च न्यायालय में चुनौती देते हुए कहा था कि मामला गंभीर वित्तीय धोखाधड़ी से जुड़ा है और सीबीआई जांच लंबित होने के कारण आरोप-पत्र जारी करने में देरी हुई।
उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि केवल आपराधिक जांच लंबित होने के आधार पर किसी कर्मचारी को अनिश्चितकाल तक निलंबित नहीं रखा जा सकता। अदालत ने यह भी कहा कि आरोप-पत्र जारी होने के बाद विभागीय कार्यवाही 2026 तक चलती रही और इसे इतनी लंबी अवधि तक लंबित रखने का कोई संतोषजनक कारण सामने नहीं आया।———–