जयपुर, 04 नवंबर । चार महीने के चातुर्मास के बाद भगवान विष्णु के योगनिद्रा से जागने के साथ ही शहर में मांगलिक आयोजनों की शुरुआत हो जाएगी। आगामी 21 नवंबर को देवउठनी एकादशी का पर्व धूमधाम से मनाया जाएगा। इस दिन सिद्धि योग, उत्तराभाद्रपद के बाद रेवती नक्षत्र और शनिवार का विशेष संयोग बन रहा है। इस अवसर पर घरों और मंदिरों में माता तुलसी का विवाह भगवान शालिग्राम के साथ विधि-विधान से कराया जाएगा। ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार यह शुभ संयोग पूजा-पाठ, दान और आध्यात्मिक कार्यों के लिए अत्यंत फलदायी माना गया है।
ज्योतिषाचार्य बनवारी लाल शर्मा ने बताया कि पंचांग के अनुसार 21 नवंबर को सुबह 6:32 बजे तक एकादशी तिथि रहेगी, जिसके बाद द्वादशी तिथि शुरू होगी जो 22 नवंबर की सुबह 4:57 बजे तक रहेगी। उत्तराभाद्रपद नक्षत्र सुबह 6:51 बजे तक रहेगा, जिसके बाद रेवती नक्षत्र प्रारंभ हो जाएगा।
सूर्य और चंद्रमा की स्थिति के आधार पर बनने वाला ‘सिद्धि योग’ 21 नवंबर को देर रात करीब 2:30 बजे तक रहेगा, जिसे शुभ कार्यों और साधना के लिए उत्तम माना जाता है। इस दिन तुलसी विवाह का प्रदोष काल शाम 5:14 बजे से 7:53 बजे तक रहेगा, वहीं अभिजीत मुहूर्त सुबह 11:30 बजे से दोपहर 12:13 बजे तक रहेगा।
हिंदू मान्यताओं के अनुसार आषाढ़ शुक्ल एकादशी से कार्तिक शुक्ल एकादशी तक भगवान विष्णु योगनिद्रा में रहते हैं, जिसे चातुर्मास कहा जाता है। इस अवधि में विवाह सहित अन्य मांगलिक कार्य स्थगित रहते हैं। देवउठनी एकादशी पर चातुर्मास समाप्त होने के साथ ही विवाह व अन्य शुभ कार्यों का सिलसिला पुनः शुरू हो जाएगा। हालांकि, विवाह के मुख्य मुहूर्त पंचांग के अनुसार अलग से तय होंगे। इसके बाद 24 नवंबर को देव दीपावली का पर्व मनाया जाएगा।