ढोल-दमाऊ और हुड़का की प्रस्तुतियों ने दिखाई उत्तराखंड की लोक विरासत

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हल्द्वानी, 20 सितंबर । उत्तराखंड की लोक संस्कृति और पारंपरिक वाद्य परंपराओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के उद्देश्य से रविवार को उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय के सीडीएस जनरल बिपिन रावत बहुउद्देशीय सभागार में ढोल-दमाऊ कार्यशाला आयोजित की गई। ‘अपनी धरोहर न्यास’ के तत्वावधान में आयोजित कार्यक्रम में ढोल-दमाऊ और हुड़का सहित पारंपरिक लोकवाद्यों की सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक महत्ता प्रस्तुतियों के माध्यम से बताई गई।

कार्यक्रम का शुभारंभ ढोल-दमाऊ की पारंपरिक थाप, दीप प्रज्ज्वलन और शगुन आखर के साथ हुआ। इस दौरान अतिथियों को ढोल-दमाऊ की लघु प्रतिकृति स्मृति चिह्न के रूप में भेंट कर सम्मानित किया गया।

यू-कॉस्ट के महानिदेशक प्रो. दुर्गेश पंत ने कहा कि ऐसे आयोजन सांस्कृतिक चेतना को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उन्होंने लोक संस्कृति के प्रति नई पीढ़ी का जुड़ाव बढ़ाने के लिए इस तरह के कार्यक्रम नियमित रूप से आयोजित किए जाने पर जोर दिया।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह प्रांत प्रचारक चंद्रशेखर ने कहा कि संस्कृति और परंपराओं की निरंतरता तभी बनी रह सकती है, जब उनके मूल्यों और परंपराओं को अगली पीढ़ी तक पहुंचाया जाए। उन्होंने युवाओं को लोक संस्कृति और विरासत से जोड़ने की आवश्यकता बताई।

कार्यशाला में डॉ. सोहन लाल और उनकी टीम ने ढोल-दमाऊ की प्रस्तुति दी। कलाकारों ने विभिन्न तालों और प्रहारों के सांकेतिक महत्व की जानकारी देते हुए बताया कि इन वाद्यों का प्रयोग उत्तराखंड के पर्वों, अनुष्ठानों और विभिन्न लोक परंपराओं में होता है। श्री मोहन लाल और उनकी टीम की प्रस्तुति में उनके आठ वर्षीय पौत्र हितेश कुमार ने भी भाग लिया। इस दौरान कुमाऊंनी संस्कृति में ढोल-दमाऊ के विभिन्न प्रयोगों और जागर जैसी परंपराओं में इनके महत्व की जानकारी दी गई।

सुंदर दास और उनकी टीम ने पारंपरिक वाद्य हुड़का की प्रस्तुति दी। कलाकारों ने इसके सांस्कृतिक महत्व और धार्मिक एवं लोक अनुष्ठानों में उपयोग के बारे में बताया।

कार्यक्रम में उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय पर आधारित वृत्तचित्र भी प्रदर्शित किया गया। इसमें विश्वविद्यालय के विस्तार, क्षेत्रीय अध्ययन केंद्रों में हुए विकास, प्रवेश संख्या में वृद्धि और संस्थान की विकास यात्रा को दर्शाया गया।

विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. नवीन चंद्र लोहानी ने कलाकारों की प्रस्तुतियों की सराहना करते हुए अतिथियों और दर्शकों का आभार जताया। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय के शुभ अवसरों और विभिन्न कार्यक्रमों में उत्तराखंड की लोक संगीत परंपरा को शामिल करने का प्रयास किया जा रहा है। भविष्य में भी ऐसे सांस्कृतिक आयोजन किए जाएंगे।

इस अवसर पर ‘बैणी सेना’, ‘साथी’ सहित विभिन्न संगठनों और सांस्कृतिक संस्थाओं को सम्मानित किया गया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में स्थानीय निवासी, संस्कृति प्रेमी और लोक कला के प्रशंसक उपस्थित रहे।

कार्यक्रम का संयोजन एवं संचालन प्रो. राकेश चंद्र रयाल ने किया। आयोजन व्यवस्था में न्यास के अध्यक्ष विजय भट्ट, कृष्ण चंद्र बेलवाल, गोपाल सिंह पटवाल सहित आयोजन टीम के सदस्यों ने सहयोग किया।