पटना, 12 जून । प्रख्यात मैथिली और हिंदी लेखक नागार्जुन के व्यक्तित्त्व और कृतित्व पर साहित्य अकादमी, नई दिल्ली और चेतना समिति, पटना के संयुक्त तत्त्वावधान में दो दिवसीय मैथिली संगोष्ठी का मिथिला भवन, राजेंद्र नगर, पटना में शुक्रवार को समापन हुआ।
संगोष्ठी के अंतिम दिन विद्यानंद झा एवं प्रमोद कुमार झा की अध्यक्षता में दो सत्र हुए। जिनमें कृष्ण मोहन झा ‘मोहन’, अरुण कुमार सिंह, भास्कर ज्योति, मेनका मल्लिक, आशीष चमन एवं पल्लवी मंडल अपने-अपने आलेख प्रस्तुत किए।
इन आलेखों के जरिए यात्री (नागार्जुन) की काव्य साधना, गद्य साहित्य के समग्र विश्लेषण के साथ ही उनकी स्त्री दृष्टि, मिथिला की सामाजिक समस्याओं के प्रति उनका दृष्टिकोण और यात्री साहित्य में मिथिला और मैथिली की उपस्थिति पर सारगर्भित चर्चा हुई।
संगोष्ठी में उपस्थित विद्वानों ने एकमत से कहा कि महाकवि यात्री का साहित्य सामाजिक चेतना, लोकतांत्रिक मूल्यों, मानवीय संवेदनाओं और जनसरोकारों का सशक्त दस्तावेज है तथा नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा।
उसके पूर्व 11 जून को उद्घाटन सत्र में स्वागत भाषण ,साहित्य अकादेमी के सचिव वरुण गुलाटी द्वारा दिया गया तथा बीज भाषण प्रख्यात मैथिली लेखक तारानंद वियोगी द्वारा प्रस्तुत किया गया। विषय प्रवर्तन मैथिली परामर्श मंडल,साहित्य अकादेमी की सदस्य, वीणा ठाकुर ने किय। इस सत्र की अध्यक्षता चेतना समिति के अध्यक्ष,विवेकानंद झा ने की और धन्यवाद ज्ञापन समिति के सचिव,जयदेव मिश्र द्वारा व्यक्त किया गया।
स्वागत वक्तव्य में साहित्य अकादमी के सचिव वरुण गुलाटी ने कहा कि यात्री-नागार्जुन जैसे साहित्यकार को केवल मिथिला तक सीमित कर देना उचित नहीं है। अब समय आ गया है कि बाबा को वैश्विक स्तर पर स्थापित किया जाए। वीणा ठाकुर ने यात्री की कविता में सौंदर्यबोध पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि बाबा ने अत्यंत सामान्य वस्तुओं के सौंदर्य को भी सहजता के साथ प्रस्तुत किया, जो अभूतपूर्व है। तारानंद वियोगी ने कहा कि बाबा ने मैथिली और हिंदी के अतिरिक्त संस्कृत और बांग्ला में भी लेखन किया, लेकिन मिथिला उनसे कभी अलग नहीं हुई। वस्तुतः उन्होंने बांग्ला, हिंदी और संस्कृत में भी मिथिला को ही अभिव्यक्त किया।
इस दिन के दो अन्य सत्रों में क्रमशः अशोक और गंगानाथ गंगेश की अध्यक्षता में दिलीप कुमार झा, कुमार राहुल, सुरेंद्र भारद्वाज, पुतुल प्रियम्बदा, वैद्यनाथ मिश्र और विभा कुमारी अपने-अपने आलेख प्रस्तुत किए।