दो से अधिक बच्चे होने पर चुनाव लड़ने से रोक खत्म होनी चाहिए : सुप्रीम कोर्ट

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नई दिल्ली, 04 नवंबर । उच्चतम न्यायालय ने आज एक ऐतिहासिक टिप्पणी में कहा कि दो से अधिक बच्चे होने पर चुनाव लड़ने से रोकने या दंडित करने वाले कानूनों की प्रासंगिकता अब पूरी तरह खत्म हो चुकी है। जस्टिस पीएस नरसिम्हा की अध्यक्षता वाली बेंच ने स्पष्ट किया कि पिछले कुछ दशकों में आए जनसांख्यिकीय बदलावों के कारण अत्यधिक जनसंख्या का पुराना डर अब खत्म हो चुका है, जो ऐसे कानूनों का मुख्य आधार था।

अदालत ने महाराष्ट्र के ककोडा ग्राम पंचायत की पूर्व सरपंच मंगला भीमराव की अयोग्यता को रद्द कर दिया, जिन्हें तीसरा बच्चा होने पर महाराष्ट्र

ग्राम पंचायत अधिनियम, 1959 के तहत अयोग्य घोषित कर दिया गया था। अदालत ने रेखांकित किया कि साल 2003 में जब ‘जावेद बनाम हरियाणा राज्य’ मामले में दो बच्चों की नीति को सही ठहराया गया था, तब देश की कुल प्रजनन दर (टीएफआर) 3.0 थी, जो अब घटकर 1.9 हो चुकी है। यह जनसंख्या प्रतिस्थापन दर (2.1) से भी कम है, जिसका अर्थ है कि देश की जनसंख्या वृद्धि अब पूरी तरह नियंत्रण में है।

अदालत ने चेतावनी दी कि यदि इन कानूनों को नहीं बदला गया, तो भारत को भविष्य में बूढ़ी होती आबादी और कामकाजी युवाओं की कमी जैसी गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। अदालत के अनुसार ऐसे कानून नागरिकों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व से वंचित करते हैं और संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले प्रजनन स्वायत्तता के अधिकार का उल्लंघन हैं।

इस नीति की वैधता और 2003 के पुराने फैसले पर पुनर्विचार करने के लिए सुप्रीम अदालत ने अब इस मामले को एक बड़ी बेंच के पास भेज दिया है।