प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की नीदरलैंड यात्रा आज भारत की दीर्घकालिक आर्थिक, तकनीकी और सामरिक रणनीतियों को गति देने वाली यात्रा साबित हुई है। दोनों देशों के बीच 17 महत्वपूर्ण समझौतों और आशय पत्रों पर हस्ताक्षर हुए, जिनका दायरा सेमीकंडक्टर, हरित ऊर्जा, जल प्रबंधन, कृषि, उच्च शिक्षा, सांस्कृतिक विरासत और रणनीतिक साझेदारी तक फैला हुआ है।
वस्तुत: इन समझौतों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे भारत की उन जरूरतों को संबोधित करते हैं जो अगले दो दशकों में उसकी आर्थिक शक्ति और वैश्विक भूमिका तय करेंगी, इसलिए ही आज यूरोप के तकनीकी रूप से उन्नत और जल प्रबंधन में विश्व अग्रणी देशों में शामिल नीदरलैंड के साथ यह सहयोग भारत के लिए कई स्तरों पर लाभकारी माना जा रहा है।
रणनीतिक रोडमैप: अगले पाँच वर्षों की दिशा
भारत और नीदरलैंड ने “भारत-नीदरलैंड रणनीतिक साझेदारी रोडमैप 2026-2030” में जल सुरक्षा, सेमीकंडक्टर विनिर्माण, हरित ऊर्जा, क्रिटिकल मिनरल्स और शिक्षा-शोध सहयोग को प्राथमिकता दी गई है, जिसका कि सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि निजी कंपनियों और निवेशकों को स्पष्ट नीति दिशा और दीर्घकालिक भरोसा मिलेगा।यह रोडमैप यूरोप और एशिया के बीच सप्लाई-चेन पुनर्गठन की उस वैश्विक प्रक्रिया का हिस्सा भी है, जिसमें चीन पर अत्यधिक निर्भरता कम करने की कोशिश की जा रही है।
सेमीकंडक्टर क्षेत्र में बड़ा कदम
यात्रा का सबसे चर्चित समझौता टाटा इलेक्ट्रोनिक्स और एएसएमएल के बीच हुआ जोकि गुजरात के धोलेरा में स्थापित होने वाली सेमीकंडक्टर फैब परियोजना से जुड़ा है। दुनिया की सबसे उन्नत चिप निर्माण मशीनें बनाने वाली एएसएमएल का सहयोग भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। वर्तमान समय में चिप उद्योग वैश्विक अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन चुका है। मोबाइल फोन, रक्षा उपकरण, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, ऑटोमोबाइल और सुपरकंप्यूटर—सभी की निर्भरता सेमीकंडक्टर पर है।भारत लंबे समय से चिप निर्माण में आत्मनिर्भर बनने की कोशिश कर रहा था। निश्चित ही यह समझौता उस दिशा में वास्तविक प्रगति का संकेत है।
भारत के खान मंत्रालय और नीदरलैंड के विदेश मंत्रालय के बीच क्रिटिकल मिनरल्स पर समझौता हुआ है, वह भी ऐसे समय में जब दुनिया लिथियम, कोबाल्ट और रेयर अर्थ मिनरल्स की वैश्विक प्रतिस्पर्धा से गुजर रही है। इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरियाँ, सौर ऊर्जा और रक्षा तकनीक इन खनिजों पर आधारित हैं। वर्तमान में इन संसाधनों पर चीन का बड़ा नियंत्रण है। ऐसे में यह समझौता भारत को वैकल्पिक आपूर्ति-श्रृंखला विकसित करने और ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने में मदद कर सकता है।
जल प्रबंधन: डच विशेषज्ञता का लाभ
जल प्रबंधन के क्षेत्र में नीदरलैंड की विशेषज्ञता पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। समुद्र तल से नीचे बसे होने के बावजूद नीदरलैंड ने तकनीक और इंजीनियरिंग के दम पर जल संकट और बाढ़ नियंत्रण में अद्भुत सफलता प्राप्त की है। इसी अनुभव का लाभ लेने के लिए भारत के जल शक्ति मंत्रालय और डच इंफ्रास्ट्रक्चर एंड वॉटर मैनेजमेंट मंत्रालय के बीच गुजरात की कल्पसर परियोजना पर तकनीकी सहयोग का समझौता हुआ। यदि यह परियोजना सफल होती है, तो इससे तटीय क्षेत्रों में जल संरक्षण, सिंचाई और बाढ़ नियंत्रण की नई संभावनाएँ खुल सकती हैं। भारत जैसे जल संकट झेल रहे देश के लिए यह सहयोग दीर्घकालिक रूप से अत्यंत उपयोगी है।
हरित ऊर्जा और हाइड्रोजन मिशन
भारत और नीदरलैंड ने हरित हाइड्रोजन सहयोग पर रोडमैप तैयार किया है। साथ ही, नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में संयुक्त कार्य समूह बनाने पर भी सहमति बनी। भारत ने वर्ष 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन का लक्ष्य तय किया है। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और हरित हाइड्रोजन जैसे क्षेत्रों में बड़े निवेश की आवश्यकता होगी, जिसमें कि नीदरलैंड की तकनीकी क्षमता और भारत के विशाल ऊर्जा बाजार का संयोजन दोनों देशों के लिए लाभकारी हो सकता है।
कृषि और डेयरी क्षेत्र में नई संभावनाएँ
यात्रा के दौरान पश्चिम त्रिपुरा में फ्लोरीकल्चर के लिए इंडो-डच उत्कृष्टता केंद्र और बेंगलुरु में डेयरी प्रशिक्षण केंद्र स्थापित करने का निर्णय लिया गया। नीदरलैंड कृषि तकनीक, डेयरी प्रबंधन और हाइड्रोपोनिक्स में विश्व स्तर पर अग्रणी माना जाता है। भारत में छोटे किसानों और पशुपालकों को आधुनिक तकनीक, बेहतर बीज, वैज्ञानिक डेयरी प्रबंधन और निर्यात आधारित खेती का लाभ मिल सकता है।
स्वास्थ्य और शिक्षा सहयोग
भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद और नीदरलैंड के सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थान के बीच स्वास्थ्य सहयोग पर समझौता महामारी निगरानी, जैव सुरक्षा और चिकित्सा अनुसंधान को नई दिशा देनेवाला है ।कोविड महामारी के बाद वैसे भी सार्वजनिक स्वास्थ्य सहयोग का महत्व बढ़ गया है। संयुक्त शोध परियोजनाएँ भारत की स्वास्थ्य प्रणाली को तकनीकी और वैज्ञानिक रूप से अधिक सक्षम बना सकती हैं।
इसी तरह से उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भी कई महत्वपूर्ण समझौते हुए। Nalanda University और University of Groningen के बीच शैक्षणिक सहयोग तथा Leiden University Libraries और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के बीच समझौता सांस्कृतिक और बौद्धिक संबंधों को मजबूत करेगा।
सांस्कृतिक कूटनीति की बड़ी सफलता
इस बीच इस यात्रा का चोल राजवंश के ताम्रपत्रों की वापसी इस यात्रा का भावनात्मक और सांस्कृतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण पक्ष रही। भारत पिछले कई वर्षों से विदेशों में मौजूद अपनी ऐतिहासिक धरोहरों को वापस लाने के प्रयास कर रहा है। इन ताम्रपत्रों की वापसी पुरातात्विक उपलब्धि के साथ भारत की सांस्कृतिक पहचान और सभ्यतागत विरासत के सम्मान का प्रतीक भी है।
व्यापार और सीमा शुल्क सहयोग
सीमा शुल्क मामलों में पारस्परिक प्रशासनिक सहायता समझौते से दोनों देशों के बीच व्यापार प्रक्रिया अधिक पारदर्शी और तेज होगी। स्वभाविक तौर पर इससे निर्यातकों को कागजी प्रक्रियाओं में राहत मिलने और लॉजिस्टिक्स लागत घटने की संभावना है। छोटे और मध्यम उद्योगों के लिए यह विशेष रूप से लाभकारी साबित हो सकता है।
कुल मिलाकर, प्रधानमंत्री प्रधानमंत्री मोदी की यह यात्रा भारत की दीर्घकालिक रणनीतिक जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार की गई दिखाई देती है। यह साझेदारी भारत को सेमीकंडक्टर निर्माण, हरित ऊर्जा, जल प्रबंधन, कृषि आधुनिकीकरण और शिक्षा-शोध के क्षेत्रों में नई गति देनेवाली है। साथ ही, यह यूरोप के साथ भारत के बढ़ते रणनीतिक संबंधों का भी संकेत है।