वाराणसी, 25 अगस्त । उत्तर प्रदेश की धार्मिक नगरी वाराणसी में बाबा काशी विश्वनाथ (बाबा के रजत विग्रह ) मंगलवार की शाम अपने ससुराल सारनाथ पहुंचे तो देवाधिदेव के स्वागत में पूरे क्षेत्र से शिवभक्तों का सैलाब उमड़ पड़ा। चंद्रमौलीश्वर के अलौकिक स्वरूप में सपरिवार महादेव जब सुसज्जित पालकी पर विराजमान होकर बौद्ध परिपथ से निकले तो सनातन की आस्था, जैन परंपरा और बौद्ध संस्कृति एक ही राह पर साथ-साथ चलती दिखाई दी। पालकी में एक ओर महादेव की गोद में प्रथमेश और दूसरी ओर माता पार्वती विराजमान थीं।
इस दौरान शंखध्वनि, डमरुओं की और शहनाई की गूंज और हर-हर महादेव के जयघोष से वातावरण गुंजायमान रहा। महादेव के ससुराल आगमन पर स्थानीय भक्तों और तीर्थ पुरोहितों ने ऐसा स्वागत किया, जैसे वर्षों बाद घर आए दामाद के स्वागत में पूरा परिवार पलक-पांवड़े बिछा दे। प्रदोष काल में सारंग महादेव मंदिर में चंद्रमौलीश्वर को झूले पर विराजमान कराया गया और 501 पार्थिव शिवलिंगों का निर्माण कर उनका सामूहिक महाभिषेक किया गया।
—51 डमरुओं के निनाद के बीच निकली बाबा की पालकी
सारनाथ के गंज क्षेत्र स्थित संकटमोचन मंदिर से अपरान्ह तीन बजे इस दिव्य पालकी यात्रा का शुभारंभ हुआ। इससे पहले शिवांजलि के संयोजक संजीव रत्न मिश्र ने चंद्रमौलीश्वर स्वरूप का विधि-विधान से श्रृंगार किया। महाआरती और विशेष पूजन के बाद काशी विश्वनाथ डमरू दल के मोनू बाबा के नेतृत्व में 51 डमरुओं की गूंज के बीच पालकी यात्रा रवाना हुई।
पालकी के साथ पुनीत जेतली ‘पागल बाबा’ छत्र लेकर चल रहे थे, जबकि मनोज शर्मा चंवर डुला रहे थे। मार्ग में श्रद्धालुओं ने बाबा के दर्शन कर पुष्प अर्पित किए और शीश नवाया। सारनाथ पहुंचने पर सामूहिक रुद्राभिषेक पीठम के अध्यक्ष विनोद कुमार शर्मा और शिव बारात समिति के महामंत्री दिलीप सिंह और हरीश वालिया ने बाबा की अगवानी की।
—श्रेयांशनाथ की जन्मस्थली से मूलगंध कुटी विहार तक यात्रा
बाबा की पालकी म्यूजियम मार्ग से होते हुए भगवान श्रेयांशनाथ की पावन जन्मस्थली पहुंची। इसके बाद चाइना मंदिर और फिर बौद्ध धर्म के विश्वप्रसिद्ध केंद्र मूलगंध कुटी विहार की ओर बढ़ी।
बाबा की पालकी जैसे-जैसे आगे बढ़ती गई, श्रद्धालुओं की आस्था भी उसके साथ उमड़ती गई। कहीं शंख बज रहे थे तो कहीं डमरू की थाप थी।
—झूले पर विराजे महादेव, 501 पार्थिव शिवलिंगों का अभिषेक
सारंगनाथ महादेव मंदिर पहुंचते ही बाबा के ससुरालवासियों ने उनका परंपरागत भाव से स्वागत किया। प्रदोष की बेला में चंद्रमौलीश्वर को झूले पर विराजमान कराया गया। इसके बाद 501 पार्थिव शिवलिंग बनाए गए। पंचतीर्थ और पंचकूप के पवित्र जल में सर्वौषधि मिश्रित कर इन शिवलिंगों का सामूहिक महाभिषेक किया गया। मंदिर में कतारबद्ध श्रद्धालु चंद्रमौलीश्वर के सपरिवार दर्शन पाकर भाव-विभोर हो उठे। किसी ने हाथ जोड़कर नमन किया, किसी ने आंखें बंद कर मनोकामना मांगी तो कोई इस अद्भुत दृश्य को अपनी आंखों में सहेजता रहा।
—टेढ़ी नीम से आई बाबा की प्रतिमा और पालकी
इस आयोजन की सबसे बड़ी विशेषता काशी विश्वनाथ मंदिर के पूर्व महंत के आवास टेढ़ी नीम से लाई गई नक्काशीदार पालकी रही। चंद्रमौलीश्वर स्वरूप की यह प्रतिमा और पालकी काशी की प्राचीन धार्मिक परंपराओं की साक्षी है। कुंभ क्षेत्र में भी इस स्वरूप को ले जाने की परंपरा रही है। महाशिवरात्रि पर महामृत्युंजय मंदिर से निकलने वाली बाबा विश्वनाथ की प्रसिद्ध बारात में भी चंद्रमौलीश्वर स्वरूप विराजमान होते हैं।